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Khabron Ke Khiladi: राहुल गांधी के बयानों पर बवाल क्यों, किन मुद्दों पर बोलने से बच सकते थे विपक्ष के नेता?

Sat, 14 Sep 2024 09:03 PM IST
निर्मल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

Khabron Ke Khiladi: कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने हाल ही में अमेरिका का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने विभिन्न कार्यक्रमों में हिस्सा लिया और जातिगत जनगणना, आरक्षण सहित कई मुद्दों पर बात की। लेकिन उनके बयानों पर देश की सियासत एक बार फिर गरम हो गई। इसी मुद्दे पर इस हफ्ते खबरों के खिलाड़ी में चर्चा हुई। 
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खबरों के खिलाड़ी। - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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राहुल गांधी विदेश यात्रा पर जाएं और उनके बयानों पर चर्चा न हो, यह कम ही होता है। बीते हफ्ते भी राहुल की अमेरिका यात्रा के दौरान उनके दिए बयानों पर जमकर हंगामा मचा रहा। जातिगत जनगणना से लेकर आरक्षण तक के मुद्दे पर विवाद हुआ। भारत विरोधी अमेरिकी सांसद इल्हान उमर से उनकी मुलाकात पर सबसे ज्यादा विवाद हुआ। इसी मुद्दे पर इस हफ्ते के 'खबरों के खिलाड़ी' में चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह, समीर चौगांवकर, पूर्णिमा त्रिपाठी, अवधेश कुमार और राकेश शुक्ल मौजूद रहे। 

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रामकृपाल सिंह: अभिव्यक्ति की आजादी है, सभी बोल सकते हैं। मेरा मानना है कि डिजिटल मीडिया के इस दौर में आप कहीं भी बोलें, सब का असर सामान होता है। सिखों को लेकर उनके बयान से मैं जरूर असहमत हूं। भारत जिस तरह से विकास कर रहा है, उसे देखकर बहुत से विकसित देशों को यह बात पच नहीं पा रही है। हाल में जिस तरह की घटनाएं हुई हैं, ऐसे में हम सभी को इस बात पर जरूर सजग रहना चाहिए कि ऐसा कोई मौका न मिले। मैं सारी पार्टियों से यह अपेक्षा रखता हूं कि हमारे किसी कदम से उन ताकतों को बल न मिले जो हमारे बढ़ने से खुश नहीं हैं।  

पूर्णिमा त्रिपाठी: राहुल गांधी अगर ना भी बोलें और वहां जाकर सिर्फ लिखा हुआ भी पढ़ देंगे तो भी वह खबर बना जाएगी। अहम बात यह कि राहुल गांधी जो बोल रहे हैं क्या वह देशद्रोह की श्रेणी में आ जा जाता है। राहुल ने वहां वो जवाब दिया, जो उनसे पूछा गया। आज की तारीख में यह मायने नहीं रखता है कि आप सांगली में बोल रहे हैं या सैन फ्रांसिस्को में बोल रहे हैं। ऐसी कौन सी नई बात उन्होंने कही है जिसे लेकर इतना बवाल हो रहा है। 
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अवधेश कुमार: क्या यह भाजपा का मसला है। यह भारत का मसला है या केवल भाजपा का मसला है? अगर भाजपा प्रतिक्रिया नहीं करती तो क्या यह विषय नहीं होती? क्या दुनिया का कोई ऐसा देश होगा, जहां सबसे ज्यादा समय तक सत्ता में रहने वाले दल का नेता, लोकसभा में विपक्ष का नेता इस तरह देश की छवि पेश करेगा। इस तरह की भाषा क्या राजनीतिक मतभेद की भाषा है। क्या यह संभव है कि कोई नेता विदेश में जाए और कहे कि मेरे अंदर दो चरित्र हैं। राजनीतिक मतभेद और संघर्ष देश की सीमाओं के अंदर रहता है। देश के बाहर जाने पर वह भारतीय है और वह भारत का पक्ष रखेगा।    

राकेश शुक्ल: अमेरिका में राहुल गांधी का वक्तव्य और मुलाकात दोनों महत्वपूर्ण हैं। आप कुछ भी कहें, लेकिन आपके साथ नेता प्रतिपक्ष की छाया हमेशा चलेगी। ऐसी स्थिति में आप भारत के संदर्भ में कुछ भी कहते हैं तो उसका असर होगा। 2017 और 2022 में आप सांसद थे तब आपने जो कहा उसका असर अलग था, लेकिन 2024 में आप नेता प्रतिपक्ष हैं। ऐसे में आपको बोलने से पहले संयम रखना चाहिए। आप वहां भारत की सकारात्मक छवि पेश कर सकते हैं। जो आपने इल्हान उमर से मुलाकात की, वह भी अहम है। जब कश्मीर में चुनाव है, उस वक्त आप उस नेता से मुलाकात कर रहे हैं जो पीओके गई थीं। मुझे लगता है उस सांसद से मिलने से राहुल गांधी को परहेज करना चाहिए था। 

समीर चौगांवकर: राहुल के आरक्षण और सिख समुदाय को लेकर दिए बयान पर ज्यादा प्रतिक्रिया हुई थी। इनमें से आरक्षण के मामले में उनकी सफाई आई, लेकिन सिख समुदाय वाले बयान पर उनकी कोई सफाई नहीं आई। राहुल गांधी हमेशा मीडिया की सुर्खियों में रहते हैं। राहुल बोल देते हैं, उसके बाद सोचते हैं कि मैंने क्या बोला। अगर वो बोलने से पहले अपनी बातों पर विचार करते तो शायद अपने राजनीतिक करियर में कई परेशानियों से बच सकते थे। जो भी नेता होगा वो अपनी विचारधारा को साथ लेकर ही कहीं भी जाता है। मुझे लगता है कि सिख समुदाय को लेकर उन्होंने जो जिक्र किया, वह अनावश्यक था। आप आरक्षण पर बोलते, जातिगत जनगणना पर बोलते तो कोई बात नहीं होती। सिख समुदाय वाले बयान से उन्हें बचना चाहिए था।

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