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खबरों के खिलाड़ी: पाठ्यक्रमों में बदलाव से BJP को क्या फायदा, क्या एकजुट होगा विपक्ष? जानें विश्लेषकों की राय

Sat, 08 Apr 2023 09:13 PM IST
अभिषेक दीक्षित न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

Khabron Ke Khiladi Episode 7: NCERT के पाठ्यक्रमों में बदलाव पर सियासत जारी है। महात्मा गांधी की हत्या से जुड़े कुछ तथ्यों समेत कई विषयों को पाठ्यक्रम से हटाने को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने है। इसके अलावा विपक्षी एकता और जातिगत जनगणना का मुद्दा भी गरम है। आइए खबरों के खिलाड़ी कार्यक्रम में विश्लेषकों की राय के जरिए इन मामलों को समझने की कोशिश करते हैं।

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खबरों के खिलाड़ी का विश्लेषण - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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अमर उजाला की खास पेशकश 'खबरों के खिलाड़ी' की सातवीं कड़ी के साथ एक बार फिर हम आपके सामने प्रस्तुत हैं। इस साप्ताहिक शो में हम हफ्ते की बड़ी खबरों और राजनीतिक घटनाक्रम का विश्लेषण करते हैं। यह चुनावी चर्चा अमर उजाला के यूट्यूब चैनल पर लाइव हो चुकी है। इसे रविवार सुबह 9 बजे भी देखा जा सकता है। 

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इस वक्त देश में तीन बड़े मुद्दों की चर्चा हो रही है। इन्हीं के चलते सियासी गलियारे का पारा भी तेज है। पहला- NCERT के पाठ्यक्रमों में बदलाव, दूसरा- विपक्षी एकजुटता और तीसरा- जातिगत जनगणना। अमर उजाला की खास पेशकश 'खबरों के खिलाड़ी' की सातवीं कड़ी में देश के बड़े राजनीतिक विश्लेषकों ने इन्हीं मुद्दों पर चर्चा की। इस बार की चर्चा में बतौर विश्लेषक हमारे साथ विनोद अग्निहोत्री, रास बिहारी, रामकृपाल सिंह, सुमित अवस्थी, पूर्णिमा त्रिपाठी, मिहिर रंजन और हर्षवर्धन त्रिपाठी मौजूद रहे। पढ़िए चर्चा के कुछ अहम अंश..... 

सुमित अवस्थी 
'NCERT में बदलाव करके क्या सरकार इतिहास बदलना चाहती है? आखिर क्यों पाठ्यक्रमों से महात्मा गांधी की हत्या से जुड़े कुछ तथ्यों को हटाया गया? क्यों ये हटाया गया कि गांधी की हत्या करने वाला नाथूराम गोडसे हिंदूवादी नेता था? क्या पाठ्यक्रम एक विशेष विचारधारा को ध्यान में रखकर बनाया जा रहा है? 1984 दंगों को तो शामिल किया गया, लेकिन गुजरात दंगों को क्यों हटा दिया गया? आरएसएस पर लगे बैन वाले अंश को भी हटा दिया गया? इसके पीछे की क्या मंशा है? भाजपा नेता कपिल मिश्रा बोल रहे हैं कि मुगल चिंदीचोर थे। क्या सच में ऐसा करके इतिहास को बदला जा सकता है?' 
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'क्या एनसीईआरटी, जातिगत जनगणना, भ्रष्टाचार का आरोप लगाकर विपक्षी दलों के नेताओं पर हो रही सरकार की कार्रवाई जैसे मुद्दे विपक्ष को एकजुट करने में कामयाब होंगे? बड़ी संख्या में क्षेत्रीय राजनीतिक दल हैं जो जातिगत जनगणना की मांग कर रहे हैं। उत्तर से दक्षिण तक इसकी मांग हो रही है। इससे देश की राजनीति में कितना बदलाव आएगा? क्या क्षेत्रीय दल और जातिगत जनगणना की मांग करने वाली पार्टियों को इसका फायदा मिल पाएगा?'  

रामकृपाल सिंह
'सच को कभी छिपाया नहीं जा सकता है, लेकिन हमें यह देखना होगा कि अब तक जो इतिहास में लिखा गया है, उसका नजरिया क्या है? इतिहास के जरिए कहीं एक विचारधारा थोपने की कोशिश तो नहीं हुई है? अगर इस पर ध्यान देंगे तो पाएंगे कि हां, काफी हद तक लेखकों ने सिर्फ तथ्य बताने की बजाय अपनी खुद की विचारधारा बताई है। असल में होना यह चाहिए कि किसी भी किताब में किसी भी इतिहास का केवल तथ्य बताना चाहिए। उस तथ्य के आधार पर पाठक अपनी राय बना लेगा, लेकिन अभी तक इसका ठीक उल्टा होता आया है।'

'अगर हम इतिहास की बात करेंगे तो हजारों सालों के इतिहास का जिक्र करना पड़ेगा। अगर हम यह बताएंगे कि गांधी को एक हिंदूवादी ब्राह्मण ने मारा था तो हमें ये भी बताना चाहिए कि उसके बाद बड़ी संख्या में बेगुनाहों को सिर्फ इसलिए मारा गया क्योंकि वे ब्राह्मण थे। विवाद न हो, इसके लिए सबसे बेहतर तरीका यही है कि इतिहासकारों को तथ्य लिखना चाहिए। अगर आप किसी हत्यारे को हिंदूवादी और ब्राह्मण बताते हैं तो इससे पूरे समाज पर सवाल खड़े होते हैं। यह गलत है।'

'विपक्षी एकता की बात करें तो ये भी हवा में है। 1974 से 1977 के बीच में सत्ता के भ्रष्टाचार के खिलाफ तमाम लोग एकजुट हुए थे। पहली लड़ाई जयप्रकाश के नेतृत्व में लड़ी गई और दूसरी 2012 में अन्ना हजारे के नेतृत्व में। पहली बार ऐसा हुआ है कि सत्ता में बैठा आदमी (पीएम मोदी) भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रहा है और विपक्ष में बैठे लोग सुप्रीम कोर्ट जा रहे हैं।'

विनोद अग्निहोत्री 
"एनसीईआरटी पाठ्यक्रमों में बदलाव पर लोगों की राय अलग-अलग हो सकती है, लेकिन यह स्पष्ट है कि ऐसा करना ठीक नहीं है। तथ्य अलग-अलग होते हैं। सवाल यह है कि आप तथ्यों को देखते कैसे हैं? कुछ लोग बोल रहे हैं कि ऑब्जेक्टिव तथ्यों को लिखा जाना चाहिए। ऐसे तो रावण को भी बुरा नहीं कहा जाना चाहिए। सीधा लिख देना चाहिए कि रावण ने सीता का अपहरण किया। क्या यह सही होगा? इतिहास बगैर परिप्रेक्ष्य के कैसे सही होगा?'

'हां, ये भी सही है कि वामपंथियों ने जब इतिहास लिखा तो उन्होंने जानबूझकर कई चीजें छोड़ दीं, लेकिन आप तो अलग तरह की राजनीति करने आए थे। तो आप भी वैसा ही क्यों कर रहे हैं? इसे दक्षिणपंथी क्यों बना रहे हैं? आपको संतुलन बनाकर रखना चाहिए। इतिहास में तथ्यों के साथ परिप्रेक्ष्य होना जरूरी है। अगर एनसीईआरटी बोल रही है कि बोझ कम करने के लिए पाठ्यक्रमों को हटाया गया तो भी ये सिलेक्टिव क्यों हो रहे हैं?' 

'इतिहास में छेड़छाड़ का नुकसान ये है कि एक सामान्य व्यक्ति जो स्कूल से इतिहास जानता है उसकी जानकारी कम हो जाएगी। पहले जो गलतियां हुईं, उसे सही करने की जरूरत है। लेकिन उसी तरह की फिर से गलती नहीं करनी चाहिए। नाथूराम गोडसे खुद को हिंदू कहता था, यह तथ्य है। इसी तरह संघ के लोग कहते हैं कि हमारे ऊपर प्रतिबंध लगा और जो बाद में गलत साबित होते ही हटा लिया गया था। ये दोनों चीजें सही हैं। पाठ्यक्रम से इसे हटाने से तथ्य नहीं बदल जाएंगे।' 

हर्षवर्धन त्रिपाठी 
'क्या इस देश के सभी कुलपति, शिक्षक, अकादमिक लोग दक्षिणपंथी हो गए? NCERT के पाठ्यक्रमों में बदलाव को इस तरह से देखना शर्मनाक है। इसमें ये देखना होगा कि तथ्यों के साथ कहीं छेड़छाड़ तो नहीं हुई? इसका जवाब होगा नहीं... क्योंकि पाठ्यक्रम में ये तो है कि गांधी को नाथूराम गोडसे ने मारा। फिर बदलाव क्या हुआ? हटाया ये गया है कि गांधी को पुणे के एक चितपावन ब्राह्मण नाथूराम गोडसे ने मारा। ये लिखने की जरूरत नहीं है। नाथूराम गोडसे ने ही गांधी को मारा है, यह सभी जानते हैं, लेकिन इसके जरिए एक विशेष धर्म और जाति को टारगेट करना कितना सही है? अगर ऐसा हो रहा है तो फिर ये भी बताना होगा कि गांधी की हत्या के बाद बड़ी संख्या में चितपावन ब्राह्मणों को मार दिया गया।' 

'जातिगत जनगणना की बात करें तो ऐसा करवाकर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार खुद फंस गए हैं। जनगणना के दौरान बड़ी संख्या में ऐसी जातियां और उपजातियां सामने आईं हैं, जिसके बारे में अभी तक लोग जानते ही नहीं थे। ऐसे में अब इन जातियों के लोग भी कहेंगे कि हम नीतीश कुमार को अपना नेता क्यों मानें? सभी अपनी-अपनी जाति के नेताओं को आगे बढ़ाने की बात करेंगे।' 

पूर्णिमा त्रिपाठी
'इतिहासकार का काम तथ्यों के साथ-साथ परिदृश्य देना होता है। केवल तथ्य देना पत्रकार का काम है। परिदृश्य यही था कि नाथूराम गोडसे हिंदूवादी विचारधारा के थे। यह बच्चों को समझाने के लिए जरूरी है, क्योंकि तभी उन्हें समझ में आएगा कि आखिर गोडसे ने गांधी की हत्या क्यों की?' 

'एनसीईआरटी ने अभी इतिहास के तथ्यों के साथ छेड़छाड़ नहीं की है, लेकिन परिदृश्य से जरूर की है। अभी तक वामदलों के हिसाब से इतिहास लिखा गया। अब दक्षिणपंथी विचारधारा के हिसाब से लिखा जा रहा है। तथ्यों के साथ खिलवाड़ नहीं करना चाहिए, अगर जरूरी हो तो परिदृश्य पर थोड़ा सुधार जरूर कर सकते हैं।' 

'विपक्षी एकजुटता की बात करें तो ये साफ दिख रहा है कि वैचारिक तौर पर विपक्षी एकजुटता होने लगी है। अलग-अलग मुद्दों पर सब साथ आ रहे हैं। चुनाव तक काफी हद तक इसकी तस्वीर साफ हो जाएगी। प्री पोल अलायंस भले ही ना हो, लेकिन ये तय है कि पोस्ट पोल अलायंस जरूर हो जाएगा। जातिगत जनगणना से भाजपा को वोट छिटकने का डर है। जब ओबीसी व अन्य दलित वर्ग की जातियां ये देखेंगी कि उन्हें भाजपा के साथ जाने पर कोई फायदा नहीं हो रहा है तो वे उनका साथ छोड़ सकते हैं।' 

रासबिहारी 
'पाठ्यक्रम में बदलाव हमेशा से होते आए हैं। खासतौर पर इतिहास में। आज तक हमें जो इतिहास पढ़ाया जाता था, उसमें कई चीजों को छिपाया गया। जो हमारे देश की सच्चाई है, उससे हमें दूर रखा गया। हमारे यहां चाणक्य, राणा प्रताप जैसे महान शख्स हुए। ऐसे लोगों को इतिहास में कम जगह दी गई। एक सिलेक्टिव विचारधारा को बढ़ाकर पढ़ाया जाता था।' 

'देश की सच्चाई को अब तक मिथक और कल्पना का रूप दिया जाता था। श्रीराम, श्रीकृष्ण को कल्पना कहा जाता था। लंबे समय तक एक सेट विचारधारा को पढ़ाया गया। अब सही मायने में बदलाव हो रहा है। जो अच्छा काम कर रहे हैं, उन्हें उनका हक मिल रहा है। पहले वामपंथी विचारधारा वाले साहित्यकार सिर्फ अपनी विचारधारा को आगे बढ़ाते थे। वो अपने आगे दूसरों को आगे नहीं आने देते थे। अब ऐसा नहीं हो रहा है। इसलिए उन्हें दिक्कत है। जातिगत जनगणना भी मुद्दा नहीं हैं। जो लोग जातिगत राजनीति करते थे... आज वे हार रहे हैं। सपा, बसपा, जेडीएस समेत कई दल इसके उदाहरण हैं। वहीं, भाजपा ने राष्ट्रीय स्तर पर हर वर्ग और जाति के बीच अपनी अच्छी पहचान बनाई।' 

मिहिर रंजन
'जब कोई चीज पाठ्यक्रम से हटाई जाती है तो इससे मंशा पर सवाल खड़े होते हैं। ऐसे में यही करना चाहिए कि अगर किसी चीज पर लगता है कि कुछ इसमें बदलाव करना चाहिए तो उसमें जोड़कर आप अपना पॉइंट रख सकते हैं। सिर्फ हटाने से आपकी नियत पर प्रश्नचिन्ह लगते हैं। अगर एनसीईआरटी बोल रही है कि बोझ कम करने के लिए ऐसा कर रहे हैं तो ये भी गलत है। हम बचपन में जो चीजें पढ़ते हैं वो पूरे जीवनभर दिमाग पर छपी रहती है।'

'विपक्षी एकता की बात करें तो यह दो तरह से हो सकती है। पहला किसी चेहरे पर आम सहमति बनने पर और दूसरा मुद्दों के आधार पर। आज के समय विपक्ष के बीच इन दोनों को लेकर परिस्थिति नहीं बन रही है। ऐसे में संभव है कि पोस्ट पोल अलायंस हो।'
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