बिहार में चुनावों का महौल गर्म है। दोनों दलों ने अपने मुख्यमंत्री चेहरों के साथ साथ लोगों से बड़े-बड़े वादों का एक लेखा जोखा भी पेश कर दिया। दोनों दलों ने अपने घोषणा पत्र में नौकरिया, विकास महिलाओं, किसानों, युवाओं को लेकर कई बड़े बड़े वादे किए हैं। किसके वादें वोट में बदलने का ज्यादा संभावना है इस हफ्ते खबरों के खिलाड़ी में इसी विषय पर चर्चा।
बिहार में चुनाव प्रचार अपने चरम पर पहुंच गया है। दोनों बड़े गठबंधनों ने अपने-अपने घोषणा पत्र जारी कर दिए हैं। कोई इसे प्रण कह रहा है तो कोई संकल्प लेने की बात कह रहा है। दोनों में वादों की भरमार है। ये वादे कितना वोट में बदलते दिख रहे हैं? किन मुद्दों पर चुनाव लड़ा जा रहा है? सीटों का गणित कैसे बन बिगड़ रहा है? कुछ ऐसे ही सवालों पर इस हफ्ते ‘खबरों के खिलाड़ी’ में हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह, विनोद अग्निहोत्री, समीर चौगांवकर, पूर्णिमा त्रिपाठी और अभिषेक कुमार मौजूद रहे।
रामकृपाल सिंह: चुनावी घोषणा पत्र 1952 में जब पहली बार चुनाव हुए थे, तब से आ रहे हैं। अगर तब से अब तक के दो तीन घोषणापत्र पर भी ईमानदारी से काम किया गया होता तो देश का कायाकल्प हो जाता। दूसरा घोषणा पत्र कितने लोगों ने पढ़ा होगा, यह भी सवाल है। चुनाव में हमेशा परसेप्शन की लड़ाई होती है। इस चुनाव में तेजस्वी बनाम नीतीश है। एक के साथ लालू और राहुल खड़ें हैं। दूसरे के साथ नरेंद्र मोदी खड़े है। ये एक तरह से इसी का रेफरेंडम है।
अभिषेक कुमार: इस बार का चुनाव रोजगार पलायन के मुद्दे पर भी हो रहा है। इसके साथ ही जाति पर भी ये चुनाव हो रहा है। प्री पोल गठबंधन को इस बार बहुमत की स्थिति बनेगी या पोस्ट पोल कोई नया गठजोड़ होगा यह 14 नवंबर को तय होगा। जहां तक अमित शाह की बात है तो उन्होंने ये कहा है कि 14 नवंबर तक बिहार में कोई वैकेंसी नहीं है। 14 नवंबर के बाद क्या होगा यह अभी नहीं कहा जा सकता है। अमित शाह की बातों पर अगर गौर करें तो उन्होंने यह कतई नहीं कहा है कि 14 नवंबर के बाद भी नीतीश ही मुख्यमंत्री होंगे।
समीर चौगांवकर: बिहार में कोई आंकलन करना मुश्किल है। उसका एख ही फैक्टर है, वो हैं नीतीश कुमार। क्योंकि उनके दोनों हाथ में लड्डू रहता है। मुझे लगता है कि भाजपा की यह पूरी कोशिश होगी कि वो बिना नीतीश कुमार सरकार बनाने की स्थिति में आ जाए। मुझे लगता है कि भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर भले उभरे, लेकिन बिना नीतीश कुमार के वो राज्य में अपना मुख्यमंत्री बनाने की स्थिति में नजर नहीं आ रही है। प्रशांत किशोर की भूमिका की बात जहां तक है तो वो 14 नवंबर के बाद तय होगी। वो कहां जाकर रुकेंगे उसके हिसाब से सारा गुणा भाग होग।
पूर्णिमा त्रिपाठी: राहुल और तेजस्वी की जहां तक बात है तो शुरू में दोनों के बीच समन्वय की कमी दिख रही थी, लेकिन अब उसमें सुधार दिख रहा है। कांग्रेस में यह बात साफ है कि अगर महागठबंधन की सरकार बनने की स्थिति आती है तो तेजस्वी ही मुख्यमंत्री बनेंगे। शुरुआती खींचतान अब बीती बातें हो चुकी हैं। वहीं, एनडीए में ये शंका आज भी जारी है कि वहां कौन सीएम होगा। जहां तक सीटों की बात है मुझे लगता है कि कांटे की लड़ाई है। किसी एक पक्ष में कोई लहर मुझे नहीं दिख रही है।
विनोद अग्निहोत्री: चुनाव में तो वादे ही आते हैं। बिहार में नीतीश कुमार एक अलग तरह का फैक्टर हैं। नीतीश कुमार ने भाजपा को सत्ता में रखा। वहीं, दूसरी तरफ देखें तो नीतीश कुमार ही हैं जिन्होंने भाजपा को सत्त में आने से भी रोक रखा है। 25 साल से भाजपा नीतीश को मुख्यमंत्री बना रही है। अब भाजपा का कैडर, नेता अपना मुख्यमंत्री चाहते हैं। प्रशांत किशोर कितनी सीटें जीतते हैं ये अहम नहीं है, अहम ये है कि वो कितनी सीटों पर दूसरे दल का समीकरण बिगाड़ते हैं। जहां तक वादे की बात है तो ये महालौ बनाने का काम करते हैं।