फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Khabron Ke Khiladi: बहराइच से उठते बड़े सवाल, रहनुमाओं ने कैसे देश की गलियों को हिंदू-मुस्लिम में बांट दिया?

Sat, 19 Oct 2024 05:02 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

Bahraich Violence: बहराइच के महाराजगंज में हुई हिंसा के मुद्दे पर देश में राजनीति बहुत हो रही है। अखिलेश यादव कह रहे हैं कि योगी सरकार अपनी नाकामी छिपाने के लिए एनकाउंटर करती है। वहीं, मुख्तार अब्बास नकवी कह रहे हैं कि दंगाइयों की कुटाई और बलवाइयों की ठुकाई के बिना समाज की सुरक्षा नहीं हो सकती। 
विज्ञापन
खबरों के खिलाड़ी - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

बहराइच अलग-अलग वजहों से सुर्खियों में बना हुआ है। पिछले दिनों यहां आदमखोर भेड़िए मार दिए गए थे, जो इंसानों को अपना निवाला बना रहे थे। इस बार मामला ज्यादा संवेदनशील है, क्योंकि इंसान ही इंसान के सामने है। ...बहराइच के महराजगंज कस्बे में पिछले दिनों दुर्गा प्रतिमा विसर्जन की शोभायात्रा के दौरान हिंसा हुई। एक युवक की हत्या कर दी गई। बाद में पुलिस मुठभेड़ के बाद घायल अवस्था में दो आरोपी गिरफ्तार हुए। फिर राजनीति भी तेज हो गई। सपा प्रमुख अखिलेश यादव समेत कई नेताओं के बयान सामने आए। इस बार 'खबरों के खिलाड़ी' में इसी मुद्दे पर चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह, अवधेश कुमार, समीर चौगांवकर, पूर्णिमा त्रिपाठी और अनुराग वर्मा मौजूद रहे। 

विज्ञापन


अखिलेश यादव ने एनकाउंटर पर सवाल उठाए हैं, क्या यह सही है?
समीर चौगांवकर: अखिलेश यादव तो एनकाउंटर पर सवाल उठाएंगे ही। उनसे यह उम्मीद नहीं कर सकते कि वे यह कहें कि पुलिस ने त्वरित न्याय देने की कोशिश की है। पुलिस ने वहां सक्रियता दिखाई है, लेकिन अखिलेश जानते हैं कि उन्हें पहले उपचुनाव लड़ना है, फिर अगला विधानसभा चुनाव लड़ना है। इसलिए वे अपने हिसाब से बयान दे रहे हैं और अपना वोट बैंक तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं। 

अवधेश कुमार: ऐसी घटनाओं पर नेताओं को जिम्मेदारी के साथ बोलना चाहिए क्योंकि वोट की राजनीति तो बाद में भी हो सकती है। प्रतिमा विसर्जन के मामले में अत्यधिक ध्यान रखने की जरूरत है। अखिलेश कह रहे हैं कि वहां से जुलूस ही नहीं जाना चाहिए था। उनका यह बयान दुर्भाग्यपूर्ण है। यह जरूर है कि पुलिस वहां सब कुछ रोक सकती थी, पुलिस की वहां नाकामी रही है, लेकिन विपक्ष के नेताओं से हम जिम्मेदारी वाले बयानों की उम्मीद नहीं कर सकते। देश में इतनी कट्टरता वाला भाव क्यों पैदा हो रहा है, यह देखना चाहिए। यह गंभीर मुद्दा बनता जा रहा है। जैसी निंदा मुठभेड़ की हो रही है, वैसी ही निंदा वहां के युवक के साथ हुई बर्बरता की क्यों नहीं हो रही? तुष्टीकरण अब छोटा शब्द रह गया है, अब इससे आगे जाकर उकसावे वाले हालात पैदा हो गए हैं। 
विज्ञापन


अनुराग वर्मा: कुछ लोगों के मन में कानून-व्यवस्था का डर बाकी नहीं रह गया है। बहराइच में जो हुआ, वह सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं है। एक्शन-रिएक्शन जैसी बातें हो रही हैं, लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि जिस बर्बरतापूर्ण तरीके से एक युवक की हत्या हुई, राजनीतिक दल उसके बारे में बात नहीं कर रहे। यह समाज के लिए अच्छी स्थिति नहीं है। त्योहारों के दिनों में स्थानीय नेताओं की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। 

पूर्णिमा त्रिपाठी: पुलिस ने वहां पहले से इंतजाम क्यों नहीं किए थे। इसके बाद नेताओं के बयान दुर्भाग्यपूर्ण हैं। अगर देश में साम्प्रदायिकता का पारा कम करना है तो सभी को बराबरी से जिम्मेदारी लेनी होगी ताकि सकारात्मकता का माहौल बन सके। अभी ऐसा लग रहा है कि हर नेता अपनी-अपनी रोटी सेंक रहा है। 

रामकृपाल सिंह: एक युवक की हत्या हो गई, लेकिन विपक्षी दल के किसी नेता ने उस युवक का नाम तक नहीं लिया, वहीं आरोपियों के पैर में गोली लगने की बात सबने की। जब आप मरने वालों को भूल जाएं और अपराधियों को याद रखें तो यह कैसी स्थिति बन रही है? नेता चुनाव को जंग बता रहे हैं। कहा जा रहा है कि जिसने जंग टाली है, उसने जंग हारी है। रहनुमाओं के लिए चुनाव अब जंग बन गया है। गलियों को हिंदुओं और मुसलमानों में बांट दिया जाता है, लेकिन यह भुला दिया जाता कि जिसकी हत्या हुई, वह एक इंसान था। हत्या को नजरअंदाज कर घाव पर मरहम लगाए जा रहे हैं। घायल के लिए सहानुभूति जताइए, लेकिन जिसकी हत्या हुई, उसे भी तो याद रखिए।
विज्ञापन


और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें