राकेश शुक्ल: केशव प्रसाद मौर्य इस वक्त वही कर रहे हैं वो कभी अशोक सिंघल जी करते थे। संत समाज बिखरने नहीं पाए और भाजपा से दूर नहीं हो इसी का प्रयास केशव प्रसाद मौर्य ने किया है। जहां तक मुख्यमंत्री के चेहरे की बात है तो केशव प्रसाद मौर्य को मैं मुख्यमंत्री के चेहरे की रेस में नहीं देखता हूं। क्योंकि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ खुद बहुत बड़ा चेहरा हैं।
पूर्णिमा त्रिपाठी: ये सारी लड़ाई हठ योग पर आकर टिक गई है। दोनों तरफ के लोग हठ योग में आ गए हैं। जिस तरह के वीडियो आए हैं, उसे सबने देखा है। बीच में केशव प्रसाद मौर्य ने बीच बचाव की कोशिश जरूर की है। विपक्ष ने भी इसे हाथों हाथ ले लिया है। यह आपस की लड़ाई है। पहले भी हमने काशी कॉरिडोर के दौरान भी देखा था। अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के बयान भी सरकार को असहज करते रहे हैं। ये मामला भाजपा संगठन के अंदर खींचतान का भी है।
अजय सेतिया: किसी शंकराचार्य के साथ इस तरह का व्यवहार बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। लेकिन इस मामले में थोड़ा इतिहास भी देखना होगा। अविमुक्तेश्वरानंद हमेशा आरएसएस के खिलाफ बोलते रहे हैं, भाजपा के खिलाफ बोलते रहे हैं, योगी आदित्यनाथ के खिलाफ बोलते रहे हैं। कांग्रेस से उनकी नजदीकी रही है। इस सबको देखते हुए ये कहा जा सकता है कि अविमुक्तेश्वरानंद भी इस मामले को सियासी बना रहे हैं। केशव प्रसाद मौर्य के बयान के बाद उन्होंने कह दिया हि मौर्य को मुख्यमंत्री होना चाहिए, यह भी राजनीतिक बयान है।
संजय राणा: संत को धैर्य रखना जरूरी होता है। प्रश्नचिह्न उठाइये लेकिन सियासत के हिसाब से बयानबाजी नहीं होनी चाहिए। प्रशासन की जहां तक बात है तो उसे ब्लैक एंड वाइट में नियम दिए जाते हैं, उसे पालन कराना उनका काम होता है। शिष्टाचार की जहां तक बात है तो वो अलग-अलग अधिकारी का अलग-अलग होता है। शंकराचार्य को शंकराचार्य की तरह व्यवहार करना चाहिए, उसे सियासी बयानबाजी से बचना चाहिए।
विनोद अग्निहोत्री: राजनीति से परे कुछ भी नहीं है। दो तीन बाते हैं। कोर्ट ने उन्हें शंकराचार्य नहीं बनाया। शंकराचार्य वो परंपरा से ही बने। भाषा की मर्यादा के मामले में अविमुक्तेश्वरानंद जी कई बार चूक जाते हैं। जो घटना हुई है उसके बाद किसी अधिकारी जाकर उस पर खेद प्रकट करना चाहिए था। संत का परिचय दोनों पक्षों को देना चाहिए। इस तरह का दुर्व्यवहार किसी भी तरह से उचित नहीं है। मुझे लगता है अधिकारियों ने मिसहैंडिल किया है।