इस हफ्ते खबरों के खिलाड़ी में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों और राज्य में पहली बार भाजपा सरकार के गठन को लेकर चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार विनोद अग्निहोत्री, पीयूष पंत, पूर्णिमा त्रिपाठी, राकेश शुक्ल, अनुराग वर्मा और संजय राणा मौजूद रहे।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में जबरदस्त जीत के बाद भाजपा ने राज्य में अपनी सरकार बना ली है। शुभेंदु अधिकारी राज्य में भाजपा के पहले मुख्यमंत्री बन गए हैं। करीब पांच साल पहले टीएमसी से भाजपा में आए शुभेंदु के लिए पार्टी के अंदर और पार्टी के बाहर कौन सी चुनौतियां होंगी? शुभेंदु के लिए सरकार चलाने के लिए आगे किन चुनौतियों से निपटना होगा? इन्हीं सवालों पर इस हफ्ते खबरों के खिलाड़ी में चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार विनोद अग्निहोत्री, पीयूष पंत, पूर्णिमा त्रिपाठी, राकेश शुक्ल, अनुराग वर्मा और संजय राणा मौजूद रहे।
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पीयूष पंत: शुभेंदु जब से भाजपा की ओर से आगे कि गए हैं तब से वो लगातार भाजपा के एजेंडे पर आक्रामक तरीके से काम किया। बिलकुल वैसे ही जैसे असम में हिमंत बिस्व सरमा कर रहे थे। इसका उन्हें फायदा मिला है। ध्रुवीकरण का मुद्दा भाजपा के एजेंडे में रहा है। इससे उसे सफलता भी मिल रही है। इसके जरिए भाजपा 2 से बढ़ती हुई यहां तक पहुंची है।
पूर्णिमा त्रिपाठी: जिस तरह से चुनाव पूरी तरह शांति पूर्ण हुए। चुनाव के बाद जो हिंसा की घटनाएं हुईं वो बहुत दुखद है। इस तरह की आशंका जरूर थी। इस तरह की घटनाएं आगे नहीं हों ये शुभेंदु के लिए बहुत बड़ी चुनौती होगी। राजनीतिक हिंसा की संस्कृति बंगाल में पहले से रही है। इसे शुभेंदु कैसे संभालते हैं ये देखना होगा।
राकेश शुक्ल: शुभेंदु अधिकारी क्यों इसका सबसे सरल जवाब है कि लोहा, लोहे को काटता है। भाजपा की सबसे बड़ी चुनौती है जनविश्वास पर खरा उतरना है। शुभेंदु अधिकारी वो नेता हैं जिन्होंने ममता बनर्जी को फर्श से अर्श पर पहुंचाया और फिर अर्श से फर्श पर भी पहुंचाया। इससे शुभेंदु की ताकत का अंदाजा लगता है। पश्चिम बंगाल में भाजपा के परिस्थितियां बहुत अनुकूल नहीं हैं। ऐसे में शुभेंदु सबसे बेहतर विकल्प थे।
अनुराग वर्मा: शुभेंदु के सामने सबसे बड़ी चुनौती ये है कि जो ममता और लेफ्ट ने जो बंगाल बनाया है उसे कैसे बदलते हैं। जो भी राष्ट्रीय दल होते हैं वो वैसे काम नहीं कर सकती है जो क्षेत्रीय दल कर सकते हैं। ममता बनर्जी शांत बैठने वाली नेता नहीं है। वो एक घायल शेरनी की तरह हैं। शुभेंदु को इसका पता है। ममता बनर्जी के राजनीतिक करियर पर जो संकट है, उसकी वजह शुभेंदु अधिकारी ही हैं।
संजय राणा: शुभेंदु अधिकारी ने अपने आपको साबित किया है। उनके अंदर एक क्षमता थी। वो एक कैडर पर आधारित पार्टी में हैं। हर मोर्चे पर उन्होंने खुद को साबित किया है। मैं नहीं मनता कि पार्टी के अंदर उनके लिए कोई चुनौती है। कभी व्यावसायिक हब रहे कोलकाता को एक बार फिर से हब बनाना उनकी चौनती होगी। वहां के लोगों में इस बदलाव का एक उत्साह दिख रहा है। ये बदलाव का मैंडेट है।
विनोद अग्निहोत्री: भाजपा को जिस तरह का मैंडेट मिला है और जिन परिस्थितियों में मिला है, उस स्थित में शुभंदु ही सबसे बेहतर विकल्प हैं। वोट मिलना अलग बात है, लेकिन ये भी सच है कि जमीन में अभी भी भाजपा का संगठन उतना मजबूत नहीं है। शुभेंदु जिस सिस्टम से आए हैं, उसे अब वो टीएमसी से अपने साथ लेकर भी आएंगे। लेकिन उसे नियंत्रण में रखना ही उनकी बड़ी चुनौती होगी।