सरकार ने 15 अक्तूबर 2026 से 2,000 रुपये से अधिक के मर्चेंट यूपीआई भुगतान पर 0.4% MDR शुल्क लगाने की घोषणा की है। सरकार का कहना है कि ये शुल्क करोबारियों से वसूल किया जाएगा। आम उपभोक्ताओं पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा। सरकार के इस फैसले पर सियासत भी हो रही है। इस हफ्ते खबरों के खिलाड़ी में इसी पर चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार विनोद अग्निहोत्री, पूर्णिमा त्रिपाठी, राकेश शुक्ल और अजय सेतिया मौजूद रहे।
अजय सेतिया: आज 90 फीसदी लोग यूपीआई का इस्तेमाल कर रहे हैं। मुझे लगता है कि इस सीमा को दो हजार की जगह अगर पचास हजार किया गया होता तो इस मुद्दे की इतनी चर्चा नहीं हो रही होती जितनी अभी हो रही है। मुझे लगता है कि इससे जो सिस्टम पूरा बनाया गया है, उसे बहुत चोट पहुंचेगी। इस फैसले को मैं बुद्धिमत्तापूर्ण फैसला नहीं मानता हूं। जहां तक अमेरिका वाले नरेटिव है वो सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी है। इसमें कोई सच्चाई नहीं है।
पूर्णिमा त्रिपाठी: विपक्षी पार्टियां इस मुद्दे पर बहुत ज्यादा सोच रही हैं ये मुझे नहीं पता। जो टैक्स लगाया गया है वो भले बहुत छोटी रकम है, लेकिन हम अपने ही पैसे पर अतरिक्त पैसा क्यों दें? सोशल मीडिया पर दावा किया जा रहा है कि ये दबाव में लिया गया फैसला है। अगर ऐसा है तो ये हमें बिलकुल मंजूर नहीं है।
राकेश शुक्ल: अगस्त में ये संसोधन हुआ। संसद में जब ये लाया गया तब विपक्ष इसे सरकार में दबाव में लाकर इसे सिलेक्ट कमेटी को भेजवा सकता था। यूपीआई का जिस तरह का फैसला भारत सरकार ने लिया है, ये भाजपा के लिए अपने कोर वोटर को नाराज करने वाला है।
विनोद अग्निहोत्री: मुझे नहीं लगता है कि सरकार अब इस फैसले को वापस लेगी। इस फैसले के अतंरराष्ट्रीय आयाम हैं। मैं इस बात से जरूर सहमत हूं कि अगर दो हजार रुपये वाली सीमा को 50 हजार किया गया होता तो ज्यादा बेहतर होता। सरकार को दो हजार की सीमा को बढ़ाने पर विचार करना चाहिए।