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Khabaron Ke Khiladi: संसद में क्यों होता है इतना हंगामा, बहस की जगह स्थगन के ज्यादा बढ़ने की क्या वजह?

Sat, 23 Aug 2025 09:09 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र न्यूज डेस्क, अमर उजाला
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संसद का मानसून सत्र - फोटो : अमर उजाला
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संसद का मानसून सत्र इस हफ्ते समाप्त हो गया।  एक महीने चले इस सत्र में हंगामे के चलते 166 घंटे बर्बाद हुए। इस वजह से जनता के टैक्स के 248 करोड़ रुपये डूब गए। अहम विधेयक बिना चर्चा के ही पास हो गए।  आखिर सदन में इतना हंगामा क्यों होता है? सदन में बहस की जगह शक्ति प्रदर्शन पर क्यों जोर बढ़ा है? सदन चलाने में किसनी कितनी जिम्मेदारी है? कुछ इसी तरह के सवालों पर इस हफ्ते खबरों के खिलाड़ी में चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार विनोद अग्निहोत्री, अवधेश कुमार, पूर्णिमा त्रिपाठी, विजय त्रिवेदी और अनुराग वर्मा मौजूद रहे। 
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विजय त्रिवेदी: संसद के सत्र में बाधा पड़ना कोई नई बात नहीं है। अब लगता है जब सत्र होगा, तब स्पीकर ऑल पार्टी मीटिंग होगी और कहा जाएगा कि हम सब मिलकर सदन को अच्छे से चलाएंगे। लेकिन वह बात वहीं खत्म हो जाती है। अगले दिन प्रधानमंत्री भी यही अपील करते हैं कि सरकार हर सवाल का जवाब देगी, चर्चा के लिए तैयार है। सब लोग मिलकर सदन को चलाएं। लेकिन सत्र शुरू होने के महज चंद मिनट बाद ही फिर हंगामा शुरू हो जाता है। इसकी वजह दोनों पक्ष हैं। ऑपरेशन सिंदूर पर चर्चा होनी है या नहीं इस पर सरकार ने पहले फैसला क्यों नहीं किया। जब चर्चा हुई तो क्या विपक्ष ने उस तरह के सवाल भी उठाए, जिस तरह उसे सरकार को कटघरे में खड़ा करना था? एसआईआर का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट में पहले से है, उस पर चर्चा की मांग को लेकर समय बर्बाद किया गया। 

पूर्णिमा त्रिपाठी: संसद में अब लोग चर्चा करने नहीं, मल्लयुद्ध करने जाते हैं। इसी सत्र में देख लें तो अगर ऑपरेशन सिंदूर पर पहले चर्चा हो जाती तो यह पूरा सत्र दूसरे मुद्दों पर चर्चा के लिए बच जाता। जब किसी भी एक पार्टी का रवैया हठधर्मिता वाला हो जाता है तो दूसरी पार्टी से सहयोग की उम्मीद करना बेकार है। पहले ऑल पार्टी मीटिंग में सभी मुद्दों पर चर्चा की प्रथा थी। मुलाकात में संसद में चर्चा के लिए एक सॉफ्टनेस होती थी। लेकिन अब तो संसद में सभी सदस्य तलवार खींचे आते हैं।  

अनुराग वर्मा: संसद का सत्र होता है, वह अब जनता के पैसों की बर्बादी के लिए ही होता दिखता है। आज के समय में सांसदों की जो सदन में अपने आप को दिखाने और बताने की कोशिश चल रही है, उसकी वजह से संसद का यह हाल हो गया है। मुझे डर है कि अगर इस पर किसी तरह से कोई निर्णय या बात सार्थक नहीं हुई तो हम गलत दिशा में जाते जाएंगे। देश के लोकतंत्र और संसदीय व्यवस्था के लिए यह बहुत गलत होगा।
 

विनोद अग्निहोत्री: संसद में अब पार्लियामेन्टेरियंस का अभाव नजर आता है। पहले संसद में भाषणों को, बहस को सुनने में मजा आता था। तब धुरंधर पार्लियामेंन्टेरियंस होते थे। आज दोनों सदनों में इक्का-दुक्का ही होंगे, जिन्हें सुनने के लिए लोग रुकें। आज संसदीय परंपराओं का कोई मतलब ही नहीं रह गया है। इसलिए सदन में गंभीरता का भी अभाव हो गया है। जैसे नियम है कि लोकसभा में डिप्टी स्पीकर होगा, लेकिन 2019 से 2024 तक कोई डिप्टी स्पीकर नहीं रहा और अभी भी नहीं है। यह गंभीर मुद्दा है। इससे परंपराएं खत्म हो रही हैं। सदन चलाना पक्ष-विपक्ष दोनों की जिम्मेदारी है। पक्ष की जिम्मेदारी थोड़ी ज्यादा होती है, क्योंकि वह सरकार है। विपक्ष का थोड़ा हंगामा करना बनता है, लेकिन सिर्फ हल्ला ही मचाते रहना उचित नहीं है। 
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अवधेश कुमार: पूरी दुनिया में संसद ऐसे ही चल रहा है। हमारा संसद ऐसे ही चलने वाला है। इसको स्वीकार करने की जरूरत है। अगर आपको संसद में कानून पास कराना है तो किसी भी तरह करा लेना होगा। अटलजी ने कभी बहस के लिए नियमों को बनाने की कोशिश की थी, लेकिन क्या आज कोई भी प्रक्रिया का पालन होता है। गांधीजी भी एक समय कह चुके थे कि हे भगवान! संसदीय प्रक्रिया भारत को नहीं देना, क्योंकि संसदीय व्यवस्था की जननी कही जाने वाली ब्रिटिश संसद में गंभीर बहस में आपस में सांसद इतनी जोर से चिल्लाते हैं कि किसी की आवाज तक नहीं आती। गांधीजी ने यह 1909 में ही कह दिया था। सड़क के वातावरण से आज संसद के वातावरण को अलग करना असंभव हो गया है।
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