संसद का मानसून सत्र सोमवार को शुरू होने जा रहा है। इस दौरान कई अहम बिल सदन के पटल पर रखे जाएंगे। कई मुद्दे भी विपक्ष उठाने की तैयारी में है। पिछले सत्र में जो परिसीमन बिल संख्या बल की कमी के चलते गिर गया था, उसके भी फिर से पेश होने की अटकलें हैं। ये सत्र कितना हंगामेदार रह सकता है? पिछले सत्र से ये सत्र कितना अलग होगा? इस हफ्ते 'खबरों के खिलाड़ी' में कुछ ऐसे ही सवालों पर चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार विनोद अग्निहोत्री, पूर्णिमा त्रिपाठी, राकेश शुक्ल, अनुराग वर्मा और मिहिर रंजन मौजूद रहे।
मिहिर रंजन: परिसीमन बिल पर भाजपा क्यों बोलेगी? उसे जो करना होगा वो उसकी तैयारी में होगी। कांग्रेस की तरफ से ही इसका मुखर विरोध किया जा रहा है। बाकी विपक्षी दलों की ओर से ऐसा कुछ नहीं मुखर विरोध दिखा नहीं है। पिछली बार जब ये बिल गिरा था तब से अब तक काफी कुछ बदल गया है। इसलिए सरकार को अगर नंबर होने का भरोसा होगा तभी वो इस बिल को दोबारा लाएगी।
पूर्णिमा त्रिपाठी: विपक्ष इस बार बहुत एकजुट नहीं दिख रहा है। कई दलों में टूटफूट भी हो चुकी है। संख्याबल अब कांग्रेस के साथ नहीं है। जिस तरह से इस दौरान सांसदों की आवाजाही हुई है, उससे लगता है कि सरकार ने अपनी तरफ से पूरी तैयारी की है। इसलिए अगर परिसीमन बिल आता है तो वो पास हो जाएगा। अगर ये पास हो जाएगा तो ये बहुत बड़ा बदलाव होगा।
राकेश शुक्ल: इस बार जिस परिसीमन बिल की हम बात कर रहे हैं, उस बिल पर अखिलेश कांग्रेस के साथ खड़े होंगे उसकी मुझे कम उम्मीद दिखती है। सरकार की दो बड़ी प्राथमिकताएं हैं। पहला विपक्षी पार्टियां खुलकर परिसीमन बिल के समर्थन करें। दूसरा सरकार की कोशिश संख्या बल को 360 के ऊपर ही नहीं 400 तक पहुंचाने की है।
अनुराग वर्मा: अगर आप राहुल गांधी की राजनीति की बात करें तो वो तो विरोध करेंगे, इसमें कोई शक नहीं है। भले उनकी पार्टी कुछ भी तय करे। दूसरा टीएमसी के साथ हुआ है उसके बाद से हर क्षेत्रीय दल को ये डर है कि कहीं हम भी उसी स्थिति में न जाएं। क्षेत्रीय पार्टियां सत्ता से लंबे समय तक दूर नहीं रह सकती हैं। उनके सत्ता के साथ रहना है चाहे मुद्दा कुछ भी हो।
विनोद अग्निहोत्री: विपक्षी गठबंधन इस वक्त आंतरिक संकट से जूझ रहा है। खास करके पश्चिम बंगाल के चुनाव के बाद। इसके बाद बाद जो तेवर पिछले संसद सत्र के दौरान दिखाई दिए वैसे अब नहीं रहेंगे। अब हर क्षेत्रीय दल अपने हिसाब से फैसले ले रहा है। जिस तरह से शिवसेना यूबीटी टूटी है उसके बाद से एनसीपी शरद गुट ने अलग रास्ता तलाशना शुरू कर दिया है। डीएमके का भी जो चल रहा वो भी सभी को पता है। जो स्थितियां उसके हिसाब से सरकार परिसीमन बिल तभी लाएगी जब 360 नहीं बल्कि 365 का आंकड़ा जुटा लेगी।