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Khabaron ke Khiladi: योगी आदित्यनाथ और अखिलेश यादव में से किसके लिए उत्तर प्रदेश के उपचुनाव बड़ी चुनौती?

Sat, 16 Nov 2024 05:01 PM IST
अभिषेक दीक्षित न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

यूपी उपचुनाव में किसका नरेटिव काम करेगा, इसी पर इस हफ्ते के खबरों के खिलाड़ी में चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह, विनोद अग्निहोत्री, समीर चौगांवकर, अवधेश कुमार और अनुराग वर्मा मौजूद रहे। 
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खबरों के खिलाड़ी - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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महाराष्ट्र-झारखंड विधानसभा चुनाव के साथ कई राज्यों में उपचुनाव भी हो रहे हैं। सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश में नौ विधानसभा सीटों पर 20 नवंबर को उपचुनाव होना है। दोनों पक्षों की ओर से बयानबाजी जारी है। एक तरफ भाजपा 'बटेंगे तो कटेंगे' का नारा दे रही है तो दूसरी तरफ सपा पीडीए के नारे के साथ वोटर को लुभाने की कोशिश कर रही है। उपचुनाव में किसका नरेटिव काम करेगा, इसी पर इस हफ्ते के खबरों के खिलाड़ी में चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह, विनोद अग्निहोत्री, समीर चौगांवकर, अवधेश कुमार और अनुराग वर्मा मौजूद रहे। 

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समीर चौगांवकर: 2024 के लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव का पीडीए का नारा जमकर चला। इसलिए भाजपा और खासतौर पर योगी आदित्यनाथ हर तरह की कोशिश कर रहे हैं। योगी आदित्यनाथ और भाजपा पूरी कोशिश कर रहे हैं कि जो लोकसभा चुनाव में हुआ वो सिर्फ एक इत्तेफाक था। वहीं, अखिलेश यादव कोशिश कर रहे हैं कि जो सफलता उन्हें 2024 के लोकसभा चुनाव में मिली, उसे बरकार रखा जाए। अगर योगी आदित्यनाथ का 'बंटेंगे तो कटेंगे' का नारा चलता है तो अखिलेश यादव के लिए बहुत मुश्किल होगा। अखिलेश यादव का पीडीए चलता है या योगी आदित्यनाथ का 'बटेंगे तो कटेंगे' चलता है, ये तो 23 नवंबर को ही पता चलेगा। 

अवधेश कुमार: अचानक अगर चुनाव के पहले अखिलेश यादव को आजम खान याद आते हैं तो कुछ तो होगा। उत्तर प्रदेश में जिन सीटों पर उपचुनाव हो रहा है, उनमें मीरापुर में 40 फीसदी, सीसामऊ में 45 फीसदी और कुंदरकी में 65 फीसदी मुस्लिम वोट हैं। कुदंरकी में 12 उम्मीदवार हैं। इनमें सिर्फ भाजपा का उम्मीदवार गैर मुस्लिम है। अगर भाजपा इस उपचुनाव में पांच सीट भी जीतती है तो ये होगा कि उसका वोटर उसके पास वापस लौट आया है। अगर नहीं होता है तो ये अखिलेश की सफलता होगी। 
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अनुराग वर्मा: अगर उपचुनाव के नतीजों और उनके असर की बात करें तो इसके नतीजे आमतौर पर आने वाले नतीजों से अलग आते हैं। इनका उतना असर दिखता नहीं है। उपचुनाव में मुद्दों पर बात नहीं होने का मसला उठता है, लेकिन हमारे मुख्य चुनाव में भी विकास की बात नहीं होती तो उपचुनाव में कहां से होगी? सपा हो या भाजपा, दोनों राजनीतिक जमीन के आधार पर ही बयानबाजी कर रहे हैं। 

पूर्णिमा त्रिपाठी: इस उपचुनाव में कांग्रेस ने समाजवादी पार्टी के सामने पूरी तरह से आत्मसमर्पण कर दिया। इसमें कोई दो राय नहीं है। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस समाजवादी पार्टी को बड़े भाई की भूमिका में देख रही है। समाजवादी पार्टी के लिए अपने तैयार किए गए पीडीए के नरेटिव की बड़ी परीक्षा है। अगर ये नरेटिव काम आता है तो वो उसे आगे भी भुनाएंगे और उसका उन्हें लाभ भी मिलेगा। इस उपचुनाव में योगी आदित्यनाथ की सबसे बड़ी प्रतिष्ठा दांव पर है। अगर बंटेंगे तो कटेंगे नहीं चलता है तो भाजपा को 2027 में नई दिशा में सोचने पर मजबूर होना पड़ेगा। 

रामकृपाल सिंह: उपचुनाव और आम चुनाव की कोई तुलना नहीं की जा सकती है। 2019 के चुनाव से पहले तीन उपचुनाव हुए थे। फूलपुर, गोरखपुर और कैराना, तीनों में भाजपा हार गई थी। लेकिन जब आम चुनाव हुए तो भाजपा को 2014 से भी ज्यादा सीटें मिलीं। इसलिए उपचुनाव से आम चुनाव की तुलना नहीं करनी चाहिए। इसी तरह लोकसभा के चुनाव में जो वोटिंग का पैटर्न रहा, उसे ही विधानसभा उपचुनाव के लिए भी लागू नहीं करना चाहिए।

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