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निर्भया से कितनी अलग है केरल की 'जीशा' की कहानी

Tue, 10 May 2016 04:16 PM IST
दिव्या आर्य/ बीबीसी संवाददाता, केरल के पेरंबवूर से
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केरल की वो दलित महिला जिसके शरीर पर 'निर्भया' जैसी यातनाओं और बर्बरता के सबूत मिले हैं, उसके मन का एक हिस्सा तो इस हिंसक हमले के पहले ही घायल हो गया था। केरल के पेरंबवूर में 29 साल की एक दलित महिला से बलात्कार के बाद उसकी हत्या कर दी गई। मीडिया की नजर में उसकी कहानी भले ही 28 अप्रैल को आई हो पर उस कहानी का एक अहम पन्ना बहुत पहले ही पलट चुका था।
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जीवन से भरी एक लड़की, जो शास्त्रीय नृत्य में इतनी पारंगत थी कि बच्चियों को सिखाती थी और छोटी-मोटी फ‌िल्मों में डांस ग्रुप के साथ हिस्सा भी ले चुकी थी, औरत बनने तक एकदम बदल क्यों गई? जब उस पर हमला हुआ तो सबने उसकी चीखों को अनसुना क्यों कर दिया?

इन सवालों के जवाब जानने के लिए पेरंबवूर के उनकी गांव की गलियों से गुजरना होगा। बंद खिड़की और दरवाजों को खटखटा कर चुप बातों को आवाज़ देनी होगी।उनका घर एक नाले से सटा है, उसमें पानी का नल और शौचालय नहीं है, यह सब उस परिवार की गरीबी की कहानी बयान करता है।
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पीने के पानी के लिए अक़्सर उन्हें या तो कुंए या दूर लगे सरकारी नल से पानी भरने जाना पड़ता था।पर इस सबके बावजूद ये परिवार खुशहाल था। वो और उसकी बड़ी बहन, दोनों को पूरी पढ़ाई करने का मौका मिला था।

'शायद हौसला अपनी मां से ही मिला उसे'

साबू पी.एम. भी केरल के निर्भया की तारीफ करते नहीं थकते। - फोटो : bbc
सामने के घर में रहने वाले साबू पी.एम। के मुताबिक वो बहुत मेहनती थी। वो बताते हैं, ''एक बार किसी मामले में पुलिस यहां आई तो वो बड़े गर्व से उन्हें बोली कि देखिएगा आप, मैं एक दिन बड़ी वकील बनकर दिखाउंगी।'' मोहल्ले में मशहूर थी वो। भरतनाट्यम में बहुत अच्छी थी और बहन के साथ ही बच्चों को सिखाने और फ‌िल्मों में काम कर रही थी।

उनके परिवार को पहला झटका तब लगना चाहिए था, जब पिता ने घर छोड़ दिया। लेकिन उनकी मां घबराई नहीं, औरों के घर में झाड़ू-पोछा कर दोनों बच्चियों को बड़ा करती रहीं। शायद हौसला अपनी मां से ही मिला उसे। अपनी हैसियत या कम संसाधनों को परे रख कुछ कर जाने का जज़्बा।

रोज़ी देवास्सी अक़्सर उसे पानी भरते वक्त मिल जाती थीं। वो कहती हैं, ''उसके मन में बस एक बात थी कि करियर में नाम रौशन करूं और अपना घर-परिवार बनाकर मां को अच्छे से रख सकूं।'' लेकिन उनकी इस सीधी सपाट ज‌िंदगी में तब झटका लगा जब बड़ी बहन 16 साल की उम्र में घर छोड़कर अपने प्रेमी के साथ भाग गईं।

प्रेमी दलित ही था पर उप-जाति अलग थी, ना भागते तो शादी ना होती। फिर हो गई, एक बच्चा भी हुआ। लेकिन प्रेमी ने बहन को छोड़ दिया। इस पूरी घटना ने मां को दहला दिया। रोज़ी बताती हैं, ''एक डर बैठ गया था कि कहीं दूसरी बेटी के साथ भी ऐसा ना हो जाए, एक मां होने के नाते वो बहुत असुरक्षित महसूस करने लगी थीं।''

बड़ी बहन के उस एक कदम ने इसका जीवन हमेशा के लिए बदल दिया। आसपास वालों से बातचीत बंद हो गई। नृत्य सिखाने या किसी शो में हिस्सा लेना तो दूर की बात थी।हर शख्स पर मां की शक की निगाह रहती थी। हंसती मुस्कुराती आवाज मानो गले में ही रुंध के चुप हो गई थी।
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एक सादी सी ज‌िंदगी का सपना चुपचाप दम तोड़ गया

दो साल पहले इस गांव में आए एक और दलित परिवार की अंबिका कुंजीमोन बताती हैं कि उन्होंने कभी उसे किसी से बात करते नहीं देखा। वो कहती हैं, ''हमारे घर के ठीक सामने ये सरकारी नल है पर वो कभी कुछ नहीं बोली, ना हमसे कुछ मांगा, हम भी कुछ नहीं कहते कहीं हमारी नीयत पर ही सवाल न उठ जाए।'' साबू के मुताबिक उसके और उसकी मां के झगड़े आम हो चले थे, घर से अक्सर ऊंची-ऊंची आवाजें सुनाई देतीं थीं।

28 अप्रैल की शाम भी आवाजें आईं थीं। वो बताते हैं, ''मैं और कुछ साथी नाले के बंड पर बैठे थे, चीखने की आवाजें आनी शुरू हुईं तो हमने अनसुनी कर दीं, बहुत देर बाद मन में ख्याल आया कि एक बार देख लें।'' साबू अपने घर पहुंचे तो उसकी मां दरवाजे पर थीं और पागलों की तरह रो रही थीं। सब हो चुका था।


मेडिकल कॉलेज के मेडिकल अफसर के मुताबिक पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट से पता चला कि किसी तेज हथियार से उसकी आंतों को बाहर निकाला गया, उसके शरीर पर चाक़ू के 30 निशान थे और सीने में दोधारे हथियार के घाव मिले।

एक औरत ने मुझसे कहा कि ये दो मौतें हुई हैं, एक उसकी अपनी, बेहद निर्मम और हिंसक तरीके से और एक उसकी मां की, जिनका एक सादी सी ज‌िंदगी का सपना चुपचाप दम तोड़ गया है।
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