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केरल: 7.16 करोड़ के 224 आईफोन खरीदे, कई गायब; अस्पतालों में वेंटिलेटर और ऑक्सीजन प्लांट भी बेकार, जांच के आदेश

Mon, 26 Oct 2026 06:54 PM IST
हिमांशु सिंह चंदेल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

केरल के सरकारी अस्पतालों में 7.16 करोड़ रुपये के 224 आईफोन और फंडस कैमरे बेकार पड़े हैं, जबकि कई आईफोन गायब बताए जा रहे हैं। चार मेडिकल कॉलेजों में 128 वेंटिलेटर इस्तेमाल नहीं हो रहे और अलप्पुझा के दो ऑक्सीजन प्लांट भी पूरी तरह काम नहीं कर रहे। सरकार ने सतर्कता जांच कराने का फैसला किया है। आखिर उपकरणों की खरीद क्यों हुई, उनका इस्तेमाल क्यों नहीं हुआ और सरकारी धन की बर्बादी के लिए कौन जिम्मेदार है? आइए, सबकुछ विस्तार से जानते हैं...

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केरल में महंगे चिकित्सा उपकरणों की खरीद पर सवाल - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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केरल के सरकारी अस्पतालों में करोड़ों रुपये खर्च करके खरीदे गए चिकित्सा उपकरणों के इस्तेमाल नहीं होने और कुछ उपकरणों के गायब होने का मामला सामने आया है। राज्य में 7.16 करोड़ रुपये की कीमत से खरीदे गए 224 आईफोन और फंडस कैमरे अस्पतालों में बेकार पड़े हैं। इनमें से कई आईफोन गायब बताए जा रहे हैं। इस मामले ने सरकारी धन के इस्तेमाल और चिकित्सा उपकरणों की खरीद में हुई कथित गड़बड़ियों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

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केरल सरकार ने चिकित्सा उपकरणों की खरीद में कथित भ्रष्टाचार और सरकारी धन की बर्बादी की जांच के लिए सतर्कता एवं भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (वीएसीबी) से जांच कराने का फैसला किया है। स्वास्थ्य मंत्री के. मुरलीधरन ने सोमवार को विधानसभा में यह जानकारी दी। कांग्रेस विधायक अबिन वार्की कोडियाट्टू ने सदन में इस मामले को उठाया था। इसके बाद सरकार ने उपकरणों की खरीद, उनकी गुणवत्ता और लंबे समय से इस्तेमाल नहीं होने के कारणों की जांच कराने की बात कही।

7.16 करोड़ के आईफोन और कैमरे क्यों पड़े हैं बेकार?
राज्य में सरकारी अस्पतालों के लिए 224 आईफोन खरीदे गए थे, जिनकी कुल कीमत 7.16 करोड़ रुपये बताई गई है। इन आईफोन के साथ फंडस कैमरे भी खरीदे गए थे। लेकिन ये उपकरण अस्पतालों में इस्तेमाल नहीं हो रहे हैं। सबसे गंभीर बात यह है कि कई आईफोन के गायब होने की भी जानकारी सामने आई है। सरकार अब यह पता लगाने की कोशिश करेगी कि इन उपकरणों की खरीद क्यों की गई, इनकी जरूरत कितनी थी और खरीद के बाद इनका इस्तेमाल क्यों नहीं हो पाया। जांच में यह भी देखा जाएगा कि उपकरणों की खरीद और उनके रखरखाव में किन अधिकारियों की जिम्मेदारी थी।
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चार मेडिकल कॉलेजों में वेंटिलेटर इस्तेमाल क्यों नहीं हो रहे?
इस मामले में प्रधानमंत्री केयर्स (पीएम केयर्स) योजना के तहत मिले 128 वेंटिलेटर भी शामिल हैं। ये वेंटिलेटर कोट्टायम, मंजेरी, कन्नूर और कोझिकोड के चार सरकारी मेडिकल कॉलेजों में इस्तेमाल नहीं हो रहे हैं। सरकार ने इनके इस्तेमाल में गुणवत्ता, सही तरीके से काम करने की क्षमता और रखरखाव पर आने वाले खर्च को लेकर चिंताएं जताई हैं। वेंटिलेटर मरीजों को सांस लेने में मदद देने वाले महत्वपूर्ण चिकित्सा उपकरण हैं। ऐसे में इनका लंबे समय तक बेकार पड़े रहना स्वास्थ्य व्यवस्था और सरकारी खर्च, दोनों पर सवाल खड़े करता है।

अलप्पुझा मेडिकल कॉलेज के ऑक्सीजन प्लांट में क्या परेशानी है?
अलप्पुझा मेडिकल कॉलेज को दिए गए दो ऑक्सीजन जनरेशन प्लांट भी पूरी तरह काम नहीं कर रहे हैं। ये प्लांट केरल मेडिकल सर्विसेज कॉरपोरेशन लिमिटेड के माध्यम से उपलब्ध कराए गए थे। जानकारी के अनुसार, ये जरूरी मात्रा और दबाव में ऑक्सीजन उपलब्ध नहीं करा पा रहे हैं। सरकार की जांच में यह पता लगाया जाएगा कि प्लांट पूरी तरह चालू क्यों नहीं हो पाए और उनकी स्थापना में कहां कमी रह गई। स्वास्थ्य विभाग के वायनाड और एर्नाकुलम स्थित संस्थानों में भी ऐसे उपकरणों की पहचान की गई है, जो इस्तेमाल नहीं हो रहे हैं।

जांच में किन पहलुओं पर ध्यान दिया जाएगा?
स्वास्थ्य मंत्री ने बताया कि स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के प्रधान सचिव की अध्यक्षता में एक विशेष टीम बनाई गई है। यह टीम उपकरणों की गुणवत्ता, उनकी खरीद की जरूरत, उन्हें स्थापित करने में आई दिक्कतों और लंबे समय तक इस्तेमाल नहीं होने के कारणों की जांच कर रही है। मेडिकल कॉलेजों से संबंधित रिपोर्ट सरकार को मिल चुकी हैं और उनकी समीक्षा की जा रही है। जांच के दायरे में केवल कोरोना महामारी के दौरान हुई खरीद ही नहीं, बल्कि अन्य समय में खरीदे गए उपकरण भी शामिल हैं। इनमें से कई उपकरण उस समय खरीदे गए थे, जब पिनराई विजयन की पहली सरकार सत्ता में थी।

सरकार का कहना है कि चिकित्सा उपकरणों पर खर्च किए गए सार्वजनिक धन को बर्बाद नहीं होने दिया जा सकता। जांच के बाद जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका तय की जाएगी और उचित कार्रवाई की जाएगी। सरकार उन उपकरणों को दूसरे अस्पतालों में भेजने पर भी विचार कर रही है, जो इस्तेमाल करने योग्य हैं और जहां उनकी जरूरत है। राज्य में बायोमेडिकल उपकरणों के रखरखाव का कार्यक्रम और जिला स्तर पर निगरानी व्यवस्था भी मौजूद है। अब सतर्कता जांच से यह स्पष्ट करने की कोशिश होगी कि करोड़ों रुपये के उपकरण अस्पतालों में बेकार क्यों पड़े रहे और इस मामले में किसकी जिम्मेदारी बनती है।
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