हाईकोर्ट ने अपने 205 पन्नों के फैसले में 10 आरोपियों की याचिकाओं को खारिज कर दिया जिनमें उन्होंने अपनी दोषसिद्धि और एनआईए अदालत की ओर से सुनाई गई उम्रकैद की सजा के फैसले को चुनौती दी थी। ये मामला जम्मू-कश्मीर के आतंकी शिविरों में केरल के युवाओं को भर्ती करने से जुड़ा हुआ है।
केरल हाईकोर्ट ने सोमवार को लश्कर-ए-तैयबा के संदिग्ध सदस्य तदियंतविडे नसीर समेत 10 आरोपियों को सुनाई गई उम्रकैद की सजा को बरकरार रखने का आदेश सुनाया। इन लोगों को यह सजा साल 2013 में एक विशेष एनआईए अदालत ने केरल के युवाओं को भारत के खिलाफ जंग छेड़ने के लिए जम्मू-कश्मीर में आतंकी कैंप्स में भर्ती करने के मामले में सुनाई थी।
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हाईकोर्ट ने सजा को बरकरार रखने का आदेश देते हुए कहा, 'ऐसे लोगों से, जिनके दिमाग में ऐसे उग्रवादी विचार हैं, हम केवल इतना ही कह सकते हैं कि अगर आप इतिहास को उठा कर देखेंगे तो पता चलेगा कि दीवार के दूसरी ओर की घास ज्यादा हरी नहीं है।'
यूएपीए के तहत भी सुनाई गई थी उम्रकैद की सजा
एनआईए (राष्ट्रीय जांच एजेंसी) अदालत ने भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 121 और 121ए के प्रावधानों के तहत 13 लोगों को भारत के खिलाफ जंग छेड़ने और इसकी साजिश रचने के अपराध में दोषी ठहराया था और सभी को उम्र कैद की सजा सुनाई थी। अदालत ने उन्हें गैरकानूनी गतिविधि निवारण अधिनियम (यूएपीए) के तहत भी उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
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न्यायाधीश के विनोद चंद्रन और सी जयचंद्रन की पीठ ने 13 में से 10 आरोपियों की दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा और बाकी तीन को बरी कर दिया। बरी किए गए तीन लोग एमएच फैसल, उमर फारूक और मोहम्मद नवस हैं। हालांकि, बाकी 10 दोषियों के लिए हाईकोर्ट की पीठ ने कहा कि उनको सुनाई गईं उम्रकैद की दोनों सजाएं साथ-साथ चलेंगी।