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Kerala HC: सरकार से पूछा- क्या जातिगत कब्रिस्तान-श्मशान के लिए लाइसेंस देना जरूरी, कहा- इससे कानून का उल्लंघन

Mon, 24 Apr 2023 02:49 PM IST
जलज मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

मामले में तत्कालीन पलक्कड़ कलेक्टर ने याचिका का विरोध किया है। उन्होंने विरोध करते हुए कहा कि कब्रिस्तान स्थानीय निवासियों ने खरीदा था, जो एक निजी भूमि है। अनुसूचित जाति के लोगों के लिए एक अलग कब्रिस्तान बनाया गया है। कलेक्टर ने कहा था कि स्थानीय लोगों ने कोरोना के डर से महिला के शव को दफनाने के लिए अनुमति नहीं दी थी।
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Court Room - फोटो : Social Media
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विस्तार
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केरल हाई कोर्ट ने केरल सरकार को जांच के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने राज्य सरकार से कहा कि क्या समुदाय और जाति के आधार पर कब्रिस्तान और शमशान घाट के लिए अलग-अलग लाइसेंस देने की आवश्यकता है। दरअसल, कोर्ट एनजीओ के एक मामले में सुनवाई कर रही थी। हाई कोर्ट का कहना है कि किसी भी सार्वजनिक कब्रिस्तान में व्यक्ति को किसी भेदभाव के दफनाने की अनुमति दी जानी चाहिए।

जानिए…क्या है पूरा मामला

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समाज के हित में काम करने वाले एक एनजीओ ने हाईकोर्ट में याचिका लगाई थी। याचिका में एनजीओ ने अप्रैल 2020 की एक घटना का जिक्र करते हुए कहा था कि पलक्कड़ जिले के पुथुर ग्राम पंचायत के चक्किलियन समुदाय की एक महिला को इलाके के कब्रिस्तान में दफनाने की अनुमति नहीं दी गई थी। चक्किलियन समुदाय एक अनुसूचित जाति है, जो समाज के हाशिए पर है। एनजीओ ने आरोप लगाया था कि प्रमुख जाति के सदस्यों ने मृतक के परिवार को धमकाया भी था। एनजीओ ने अपनी याचिका में अनुरोध किया है कि चक्किलियन समुदाय के मृतकों को सार्वजनिक कब्रिस्तान में दफनाने की अनुमति दी जाए।

तत्तकालीन कलेक्टर ने याचिका का किया विरोध
मामले में तत्कालीन पलक्कड़ कलेक्टर ने याचिका का विरोध किया है। उन्होंने विरोध करते हुए कहा कि कब्रिस्तान स्थानीय निवासियों ने खरीदा था, जो एक निजी भूमि है। अनुसूचित जाति के लोगों के लिए एक अलग कब्रिस्तान बनाया गया है। कलेक्टर ने कहा था कि स्थानीय लोगों ने कोरोना के डर से महिला के शव को दफनाने के लिए अनुमति नहीं दी थी। इसलिए महिला को एक बंजर जगह ढूंढकर वहां दफनाया था।

कोर्ट ने कहा कि ऐसा पहला मामला

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सुनवाई के दौरान सभी पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने कहा कि कोरोना की गंभीरता के कारण स्थानीय रहवासियों की परेशानी जायज है। कोर्ट का कहना है कि यह ऐसा पहला मामला है, इसलिए यह नहीं कह सकते कि भेदभाव हुआ है। सभी सार्वजनिक कब्रिस्तान में लोगों को दफनाने पर रोक नहीं लगाई जा सकती।

अदालत ने कहा कि सरकार ने समुदायों के आधार पर भी दफनाने के लिए लाइसेंस जारी करके इसकी अनुमति दी है। इसके अलावा कोर्ट ने कहा कि सरकार से कहा कि यह जांच कीजिए कि क्या समुदायों के आधार पर कब्रिस्तान या श्मशान भूमि के लिए अलग-अलग लाइसेंस देने की आवश्यकता है। क्योंकि ऐसे लाइसेंस संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन करते हैं।

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