दिवंगत द्रमुक प्रमुख एम करूणानिधि ने लोगों तक पहुंच बनाने और द्रविड़ विचारधारा को बढ़ावा देने के लिए फिल्मों और तमिल भाषा पर अपनी पकड़ को जरिया बनाया। उनपर लिखी गई दो पुस्तकों में यह बताया गया है।
पत्रकार संध्या रविशंकर ने अपनी पुस्तक ‘करूणानिधि: ए लाइफ इन पॉलिटिक्स’ में कहा है, “तमिल कई मायनों में उनकी ‘उयिर मूचु’ (जिंदगी) थी। उनकी राजनीति और राजनीति में उनके करियर पर तमिल का प्रभुत्व था। समय के साथ-साथ द्रविड़ आंदोलन की प्रथम पीढ़ी के नेताओं का जैसे-जैसे निधन होता गया, करूणानिधि विश्वभर में तमिल लोगों के ‘संरक्षक’ का दायित्व उठाने की कोशिश की।”
करूणानिधि को जल्द ही भाषा पर अपनी पकड़ का एहसास हो गया था। “मानव नेसान” के संपादक के रूप में, या द्रमुक के मुखपत्र “मुरासोली” के संस्थापक के रूप में अन्नादुरई द्वारा शुरू की गई पत्रिका “द्रविड़ नाडु” में प्रकशित उनके लेखों में हास्य, विचारों की स्पष्टता और तमिल इतिहास पर उनकी मजबूत पकड़ उनकी लेखनी में भी नजर आती रही।
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और करूणानिधि के आर्थिक सलाहकार रहे ए नारायण द्वारा लिखी गई दूसरी पुस्तक “द द्रविड़ियन ईयर्स : पॉलिटिक्स एंड वेल्फेयर इन तमिलनाडु” में फिल्मों और मीडिया के माध्यम से उनकी अभूतपूर्व पहुंच का जिक्र किया गया है।
तमिलनाडु के लोग हमेशा से ही सिनेमा के प्रशंसक रहे हैं। करूणानिधि ने करीब 70 फिल्मों की पटकथा लिखी जिनमें “पराशक्ति”, “मंतिरी कुमारी”, “मलैकलन” और “मनोहरा” जैसी हिट फिल्में भी शामिल हैं।