इस्लामी कानून में यौवनावस्था हासिल होने पर विवाह को सही माना गया है, यौवनावस्था शुरू होने की उम्र 15 साल बताई गई है। यह तर्क खारिज कर जस्टिस राजेंद्र बदामीकर ने कहा कि पॉक्सो विशेष कानून है, यह पर्सनल लॉ से ऊपर रहता है।
इस्लामी कानून के अनुसार शादी के लिए न्यूनतम उम्र को 15 वर्ष मानने के तर्क को कर्नाटक हाईकोर्ट ने पॉक्सो और आईपीसी के मामलों में नकार दिया है। दो अलग-अलग मामलों की सुनवाई में हाईकोर्ट ने कहा, पॉक्सो और आईपीसी के सामने पर्सनल लॉ रद्द माना जाता है।
विज्ञापन
पहले मामले में 27 साल के एक मुस्लिम पुरुष पर नाबालिग लड़की से बाल विवाह का आरोप है। लड़की गर्भवती हुई तो उसे मेडिकल जांच के लिए अस्पताल पहुंची। यहां चिकित्सा अधिकारी ने पुलिस को सूचित किया, जिस पर आदमी पर बाल विवाह रोकथाम अधिनियम और प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्शुअल ऑफेंस (पॉक्सो) के तहत केस दर्ज हुए।
याची के वकील के अनुसार, इस्लामी कानून में यौवनावस्था हासिल होने पर विवाह को सही माना गया है, यौवनावस्था शुरू होने की उम्र 15 साल बताई गई है। यह तर्क खारिज कर जस्टिस राजेंद्र बदामीकर ने कहा कि पॉक्सो विशेष कानून है, यह पर्सनल लॉ से ऊपर रहता है। इसमें यौन संबंधों के लिए न्यूनतम उम्र 18 वर्ष मानी गई है। आरोपी ने शादी से जुड़े साक्ष्य निचली अदालत में दिए थे, इसलिए बेल पर आपत्ति नहीं की जा रही है। अदालत ने आरोपी को जमानत दे दी।
विज्ञापन
पर्सनल लॉ को आधार बना जमानत नहीं
दूसरा मामला 19 साल के एक लड़के पर 16 साल की लड़की से दो बार दुष्कर्म करने का है। उसके खिलाफ आईपीसी और पॉक्सो के तहत चिकमंगलूर की अदालत में केस चल रहा है, चार्जशीट दायर हुई है। याची के वकील ने तर्क रखा कि लड़का व लड़की दोनों मुसलमान हैं। इस्लामी कानून में यौवनावस्था को 15 वर्ष से शुरू माना गया है, इसलिए आरोपी को जमानत मिलनी चाहिए, लेकिन हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर कहा कि पर्सनल लॉ को आधार बनाकर जमानत नहीं ली जा सकती। दोहराया, आईपीसी और पॉक्सो कानून पर्सनल लॉ के ऊपर माने जाते हैं।