कर्नाटक हाईकोर्ट ने तत्काल टिकट बुकिंग टूल को लेकर स्टार्टअप मालिक के खिलाफ दायर आपराधिक केस को खारिज कर दिया है। मामले में अदालत ने फैसला सुनाया कि एक ब्राउजर एक्सटेंशन बनाना, जिसने सामान्य तत्काल बुकिंग समय को पांच-सात मिनट से घटाकर केवल 45 सेकंड कर दिया, रेलवे अधिनियम का उल्लंघन नहीं है।
कर्नाटक उच्च न्यायालय ने एक आईआईटी स्नातक और स्टार्टअप संस्थापक के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को खारिज कर दिया है, जिन्होंने एक सॉफ्टवेयर टूल विकसित किया था, जिसने रेलवे तत्काल टिकट बुक करने में लगने वाले समय को काफी कम कर दिया था। जानकारी के मुताबिक गौरव ढाके पर रेलवे अधिनियम की धारा 143 के तहत कथित रूप से अवैध रूप से रेलवे टिकट खरीदने और वितरित करने का आरोप लगाया गया था, उनके खिलाफ इस केस को न्यायमूर्ति एम नागप्रसन्ना की एकल न्यायाधीश पीठ की तरफ से खारिज कर दिया गया।
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'ब्राउजर एक्सटेंशन बनाना रेलवे अधिनियम का उल्लंघन नहीं'
मामले में कर्नाटक हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि गौरव ढाके की तरफ से एक ब्राउजर एक्सटेंशन बनाना, जिसने सामान्य तत्काल बुकिंग समय को पांच-सात मिनट से घटाकर केवल 45 सेकंड कर दिया, ये रेलवे अधिनियम का उल्लंघन नहीं है। आईआरसीटीसी वेबसाइट पर बुकिंग प्रक्रिया को तेज करने के लिए यात्री के विवरण को स्वतः भरने वाला यह सॉफ्टवेयर टूल शुरू में मुफ्त में दिया गया था।
2020 में रेलवे ने दर्ज किया था आपराधिक मामला
हालांकि, फरवरी 2020 में, गौरव ढाके ने एजेंटों की तरफ से बल्क टिकटिंग को रोकने के लिए इसके उपयोग को प्रति दिन 10 बुकिंग तक सीमित कर दिया और प्रामाणिकता के लिए प्रति बुकिंग 30 रुपये चार्ज करना शुरू कर दिया। इस मामले में रेलवे ने सितंबर 2020 में गौरव ढाके को नोटिस जारी किया, जिसके बाद उनके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किया गया।
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गौरव ने 12 लाख रुपये से अधिक का मुनाफा कमाया- RPF
वहीं रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ) ने तर्क दिया कि गौरव ढाके ने उस सॉफ्टवेयर कि मदद से 12 लाख रुपये से अधिक का मुनाफा कमाया है, लेकिन अदालत को अवैध टिकट खरीद या आपूर्ति का कोई सबूत नहीं मिला, जो रेलवे अधिनियम की धारा 143 के तहत आरोपों को सही ठहराने के लिए जरूरी घटक हैं।
याचिकाकर्ता अनधिकृत व्यवसाय में लिप्त नहीं है- कोर्ट
इस मामले में अदालत ने कहा, याचिकाकर्ता रेलवे टिकट खरीदने या वितरित करने के अनधिकृत व्यवसाय में लिप्त नहीं है, आरोपों को प्रक्रिया का दुरुपयोग बताते हुए खारिज कर दिया। न्यायमूर्ति नागप्रसन्ना ने इसी तरह के एक मामले में 2016 के केरल उच्च न्यायालय के फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि गौरव ढाके के मामले के तथ्य कानूनी कार्यवाही जारी रखने की गारंटी नहीं देते हैं। गौरव ढाके ने तर्क दिया था कि उनके उपकरण ने केवल सार्वजनिक लाभ के लिए बुकिंग प्रक्रिया को तेज किया था और इसका अवैध उपयोग करने का इरादा नहीं था।