कर्नाटक सरकार राज्य के कुछ विधायकों के कहने पर डीजे हल्ली और केजे हल्ली, शिवमोगा, हुबली सहित अन्य स्थानों पर विरोध प्रदर्शन और दंगों में शामिल युवाओं के खिलाफ मामले वापस लेने की सोच रही है। अगस्त 2020 में पूर्वी बेंगलुरु में दंगे हुए थे, जिसमें कथित तौर पर एसडीपीआई के सदस्यों की संलिप्तता थी और वे मुख्य आरोपी थे। इसकी मजिस्ट्रेट जांच में एसडीपीआई की भूमिका की ओर भी इशारा किया गया था।
विपक्षी भाजपा ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है और राज्य की कांग्रेस सरकार पर ‘‘एक समुदाय के सांप्रदायिक अपराधियों को क्लीनचिट देने और जिहादियों एवं पीएफआई आतंकवादियों के इशारे पर काम करने’’ का आरोप लगाया है। कर्नाटक के गृह मंत्री परमेश्वर ने कारागार विभाग के प्रधान सचिव को 19 जुलाई को लिखे एक नोट में नरसिम्हाराजा के विधायक और पूर्व मंत्री तनवीर सैत के अनुरोध का हवाला दिया है।
गृह मंत्री के नोट में कहा गया कि अनुरोध किया गया है कि बेंगलुरु के डीजे हल्ली और केजी हल्ली, शिवमोगा, हुबली और अन्य स्थानों पर विरोध प्रदर्शन एवं दंगों के सिलसिले में निर्दोष युवाओं और छात्रों को झूठे मामलों में गिरफ्तार किया गया है, समीक्षा के बाद नियमों के अनुसार ऐसे मुकदमों को वापस लिया जाए । इस संबंध में समीक्षा के बाद आवश्यक कार्रवाई करने का निर्देश दिया जाता है।’
मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने इस मुद्दे पर टिप्पणी करते हुए कहा कि सरकारी स्तर पर इसकी समीक्षा की जाएगी। बाद में पत्रकारों से बातचीत में परमेश्वर ने कहा कि मामलों को वापस लेने की एक प्रक्रिया है और ऐसे फैसले मुख्यमंत्री या गृह मंत्री तुरंत नहीं ले सकते। उन्होंने कहा कि इस तरह का निर्णय गृह मंत्री के नेतृत्व में एक कैबिनेट उप समिति लेती है। इसके तहत ऐसे मामलों के अनुरोध की जांच करने वाले अधिकारियों द्वारा पक्ष-विपक्ष जानकर और विस्तृत समीक्षा के बाद उप समिति के समक्ष एक रिपोर्ट रखी जाती है। इतना ही नहीं, इसके बाद मुख्य कैबिनेट के समक्ष इसे रखा जाएगा जो विस्तार से विचार-विमर्श कर निर्णय लेगी। कई ऐसे उदाहरण भी सामने आए हैं, जिसमें कैबिनेट द्वारा उप-समिति के फैसले को खारिज कर दिया।