किसने कहा कि सरकार बनाने के लिए आपको दोस्तों की जरूरत है? सरकार बनाने के लिए घोषित दुश्मन हाथों में थामे हथियारों को एक झटके में छुपा सकते हैं। सालों से कांग्रेस के सिद्धारमैया का पूर्व प्रधान मंत्री और जेडी(एस) के नेता एच डी देवेगौड़ा से विवाद रहा है। लेकिन मंगलवार को कर्नाटक चुनाव के नतीजों के बाद, दोनों पक्षों के बीच सत्ता साझा करने की सौदेबाजी के बाद सिद्धारमैया को गौड़ा का नेतृत्व स्वीकार करना पड़ा।
सिद्धारमैया और देवगौड़ा का इतिहास काफी पुराना है। सिद्धारमैया कभी देवगौड़ा के संरक्षण में राजनीति में आए थे। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक 2005 में जब देवगौड़ा ने अपने बेटे एच डी कुमारस्वामी को अपना उत्तराधिकारी बनाया तो सिद्धारमैया ने जेडी(एस) छोड़ दी।
यह पहली बार नहीं है कि सत्ता हासिल करने की कोशिश में दुश्मन दोस्त में बदल गए हों। देश भर में सरकार बनाने के लिए आखिरी मिनट पर हुए गठजोड़ हुए और तुरंत दोस्ती का चोला ओढ़ा गया।
मिसाल के तौर पर, अप्रैल 2015 में जब राष्ट्रीय जनता दल के प्रमुख लालू प्रसाद ने जनता दल (यूनाइटेड) के मुखिया नीतीश कुमार से हाथ मिलाया और उन्हें मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया, तो यह अविश्वसनीय लग रहा था। आपसी सहयोगी रहे लालू और नीतीश का संबंध बहुत कड़वाहट के साथ टूटा। बाद में दूसरी बार बिहार का मुख्यमंत्री बनने के लिए नीतीश ने बीजेपी के साथ हाथ मिला लिया। लेकिन वे 2015 में एक साथ आए थे सिर्ट कटुता के साथ अलग होने के लिए।
उत्तर प्रदेश में दशकों की प्रतिद्वंद्विता और दुश्मनी को खत्म करते हुए बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की अध्यक्ष मायावती और समाजवादी पार्टी (सपा) के प्रमुख अखिलेश यादव ने मार्च 2018 में गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा उपचुनाव के लिए गठबंधन किया। मायावती का अखिलेश के पिता मुलायम सिंह यादव 1995 में बहुत कड़वा संबंध हो गया था। जिसके बाद उन्होंने सपा नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार से समर्थन वापस लेने का फैसला किया था। सपा कार्यकर्ताओं ने समर्थन वापसी के फैसले को पलटने के लिए कथित रूप से सरकारी गेस्ट हाउस को घेर लिया था। विवाद बढ़ने पर राज्यपाल ने मुलायम सरकार को खारिज कर दिया और मायावती को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया था।
पश्चिम भारत में मराठा के मजबूत नेता शरद पवार ने सोनिया गांधी के "विदेशी मूल" को मुद्दा बनाकर उनके खिलाफ विद्रोह कर दिया था और कांग्रेस से नाता तोड़ मई 1999 में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी बनाई।
लेकिन कुछ महीनों बाद सितंबर 1999 में जब महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों ने एक बंटा हुआ जनादेश दिया तो गठबंधन की उम्मीद में पवार ने कांग्रेस का दरवाजा खटखटाया। इसके बाद कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन ने 15 सालों तक महाराष्ट्र पर शासन किया।