कर्नाटक में भाजपा और जेडीएस अपना राजनैतिक अस्तित्व स्थापित करने में लगे हुए हैं। लेकिन कांग्रेस नेता सिद्धारमैया का कद राज्य की राजनीति में कभी कम नहीं होगा। किसान परिवार से ताल्लुकात रखने वाले सिद्धारमैया की राजनीति की एक अलग शैली है। जनता दल एस में रहे सिद्धारमैया ने पिछले पांच सालों में अपने मुख्यमंत्रित्व काल में कांग्रेस की पैठ बढ़ाने की कोशिश की है। नतीजा सामने है कि ताजा चुनाव में कांग्रेस को 75 से 80 सीटें मिल सकती है। 222 सदस्यीय विधानसभा में यह प्रदर्शन संतोषजनक कहा सकता है। ऐसे प्रदर्शन के पीछे सिद्धारमैया के कद से इनकार नहीं किया जा सकता।
लोहिया के समाजवाद से प्रभावित हुए
कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने सिद्धारमैया की राजनीति को पूरे मन से स्वीकार नहीं किया लेकिन ताजा चुनाव उनके सियासी समीकरण की वजह से ही कांग्रेस के लिए इतना अहम साबित होता जा रहा है। सिद्धारमैया का जन्म 12 अगस्त 1948 को मैसूरक जिले में हुआ। मैसूर विश्वविद्यालय से स्नातक हासिल करने के बाद कानून की पढ़ाई भी की। उन्होंने वकालत भी की। राम मनोहर लोहिया के समाजवाद से प्रभावित हुए। जनता दल में शामिल हुए।
1983 में पहली बार विधायक बने
राज्य के तीसरे सबसे बड़े समुदाय कुरबा से आने वाले सिद्धारमैया पहली बार 1983 में विधायक बने। वह चामुंडेश्वरी विधानसभा सीट से लोकदल के विधायक बने। जीत के साथ जनता पार्टी में शामिल हुए। कन्नड़ भाषा का प्रचलन बढ़ाने के लिए बनाई गई कन्नड़ कवालू समिति के सिद्धारमैया पहले अध्यक्ष बने।
देवगौड़ा के साथ इनका कद भी बढ़ता गया
राज्य के मुख्यमंत्री एचडी देवगौड़ा 1996 में देश के प्रधानमंत्री बन गए। देवगौड़ा के करीबी होने की वजह से सिद्धारमैया का कद भी बढ़ा। यहां तक वह इस साल राज्य का मुख्यमंत्री बनते-बनते रह गए थे। हालांकि जेएच पाटिल उनसे इस रेस में आगे हो गए थे। सिद्धारमैया को इस दौड़ में वित्तमंत्री का पद मिला। देवगौड़ा के मुख्यमंत्रित्व काल में भी वह वित्तमंत्री थे।
सिद्धारमैया और अहिंदा का समीकरण
देश की राजनीतिक हलचल में कालांतर में जनता दल टूट गई। देवगौड़ा ने जेडीएस के नाम से नया दल बनाया। सिद्धारमैया को कर्नाटक में इस दल की कमान दी गई। सिद्धारमैया ने यहीं से कर्नाटक की राजनीति में खुद को स्थापित किया। इन्होंने राज्य में जातिगत समीकरण के तहत अल्पसंख्यक, पिछड़े और दलित के हितों को ध्यान में रखते हुए अहिंदा सम्मेलन का आयोजन किया। राज्य में एक नया राजनैतिक समीकरण तैयार किया।
सिद्धारमैया के बढ़ते प्रभाव से देवगौड़ा हुए परेशान
राज्य में सिद्धारमैया के लगातार बढ़ते कद से देवगौड़ा को परेशानी होने लगी। पूर्व पीएम अपने बेटे कुमारास्वामी को राज्य में आगे करना चाहते थे। और इसी उठा-पटक में देवगौड़ा ने सिद्धारमैया को जेडीएस से निकाल दिया। आनन-फानन में सिद्धारमैया कांग्रेस में शामिल हो गए। इसके बाद इन्होंने लगातार अपने को कर्नाटक में मजबूत किया।
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