जदएस सूत्रों के मुताबिक देवगौड़ा ने गैर भाजपा सरकार की स्थिति में फिर से पीएम पद पाने की संभावना के अलावा राज्य में दलित और मुसलिम वोट बैंक के छिटकने के डर से भाजपा से दूरी बनाई। अगले ही साल लोकसभा चुनाव हैं। इसके अलावा उन्हें भाजपा से सीएम पद मिलने की उम्मीद नहीं थी।
स्थापित परंपरा के मुताबिक त्रिशंकु विधानसभा की सूरत में राज्यपाल सबसे बड़े दल या चुनाव पूर्व गठबंधन को सरकार बनाने का न्यौता देते हैं और सदन में बहुमत साबित करने का मौका देते हैं। चूंकि कांग्रेस और जदएस का चुनाव पूर्व गठबंधन नहीं था, लिहाजा यह राज्यपाल पर है कि वे किसे सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करते हैं। भाजपा के तीन केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, प्रकाश जावडेकर और जेपी नड्डा पार्टी के पक्ष में समर्थन जुटाने के लिए जमे हुए हैं।
भाजपाः इस बात की पूरी संभावना है कि राज्यपाल सबसे बड़े दल के रूप में भाजपा को न्यौता देंगे। सदन में बहुमत साबित करने के लिए वह दो निर्दल और बसपा के एक विधायक को अपने पाले में ला सकती है। इसके अलावा कांग्रेस या जदएस के कुछ विधायकों से इस्तीफा दिलवा सकती है। इससे बहुमत का आंकड़ा घट जाएगा, जिसे पार करना उसके लिए आसान हो जाएगा।
कांग्रेस: चुनाव बाद जदएस से गठबंधन करने के कारण कांग्रेस के इस मोर्चे को न्यौता मिलने की उम्मीद कम। अगर भाजपा बहुमत साबित नहीं कर पाती है तो राज्यपाल इस मोर्चे को आमंत्रित कर सकते हैं, लेकिन इसकी संभावना कम है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सम्मोहक व्यक्तित्व और उससे पैदा होने वाली प्रलयकारी ताकत के आगे कांग्रेस बेबस है। इस चुनाव में तूफानी दौरा कर मोदी ने अकेले दम पर अपनी पार्टी को दक्षिण में फिर प्रवेश दिलाया।
शाह का तोड़ नहीं
मोदी के अलावा अगर भाजपा में किसी के सिर पर इस जीत का सेहरा बंधना चाहिए तो वे हैं पार्टी अध्यक्ष अमित शाह। चुनाव प्रबंधन में इस समय उनका कोई सानी नहीं है। उनकी अथाह ऊर्जा और अनथक प्रयास बेमिसाल हैं।
गुजरात के बाद कर्नाटक में भी उनका ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ बुरी तरह फेल हुआ। मठों और मंदिरों में मत्था टेकना काम नहीं आया। उदासीन राजनेता की छवि तोड़ी लेकिन मोदी के करिश्मा को तोड़ने के लिए उनके तरकश में कोई तीर नहीं है।
कांग्रेस को फंड का टोटा
देश के तमाम राज्यों से सफाया होने के बाद कांग्रेस के पास कर्नाटक ही एक ऐसा राज्य बचा था, जहां से पार्टी का खर्च पूरा होता था। इस राज्य को खोने का मतलब साफ है कि भविष्य में पार्टी को फंड की भारी कमी होने वाली है।
लिंगायत कार्ड नहीं चला
कांग्रेस द्वारा लिंगायतों को अलग धर्म का दर्जा देने का दाव उल्टा पड़ा। भाजपा जनता को यह समझाने में सफल रही कि कांग्रेस के पास ‘बांटो और राज करो’ के अलावा चुनाव जीतने की कोई दूसरी रणनीति नहीं है।