भाजपा कैसे निपटेगी
सत्तारूढ़ भाजपा ने 222 उम्मीदवारों में से 72 नए चेहरों को मैदान में उतारा है। हुबली धारवाड़ सीट से पार्टी ने अपने राज्य संगठन महामंत्री (संगठन) को मैदान में उतारा है। उन्होंने बयान दिया है कि पार्टी चुनावों में नए चेहरों को अवसर देना चाहती थी, यही कारण है कि कुछ पुराने चेहरों को टिकट नहीं दिया गया है। भाजपा को अनुमान है कि नए चेहरों के भरोसे वह बड़े लिंगायत नेताओं की नाराजगी को मात दे सकती है। इसी तरह के प्रयोग इसके पहले गुजरात और उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में भी किए गए थे। पार्टी के ये प्रयोग वहां सफल रहे थे।
हालांकि, कर्नाटक की स्थानीय राजनीति के जानकार मानते हैं कि भाजपा का यह दांव कर्नाटक में उलटा पड़ सकता है। इसका बड़ा कारण है कि कर्नाटक की राजनीति पार्टीगत होने की बजाय चेहरों पर ज्यादा केंद्रित होती है। यहां के मतदाता अपने नेताओं से सीधे प्रभावित होते हैं और उनके पाला बदलने पर उनके साथ वे भी पाला बदल लेते हैं। इसका प्रमाण बीएस येदियुरप्पा की भाजपा से नाराजगी के बाद पार्टी छोड़ने के दौरान हुआ था। इस बार भी भाजपा को इसी तरह का नुकसान हो सकता है।
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हालांकि, पार्टी नेता मानते हैं कि जगदीश शेट्टार या लक्ष्मण सावदी जैसे नेताओं की नाराजगी इस बार काम नहीं करेगी। इसका कारण है कि उसके खेमे में अभी भी बीएस येदियुरप्पा जैसे दिग्गज लिंगायत नेता उपस्थित हैं जो समुदाय के बड़े चेहरे के तौर पर देखे जाते हैं। उनके बेटे विजयेंद्र भी इस बार शिकारीपुरा से मैदान में हैं, लिहाजा येदियुरप्पा पार्टी को जीत दिलाने में कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ेंगे। पार्टी ने लिंगायत उम्मीदवारों को भी टिकटों में पर्याप्त भागीदारी दी है, लिहाजा उसका अनुमान है कि शेट्टार और सावदी उसे ज्यादा परेशान नहीं कर पाएंगे।
सामाजिक समीकरणों के भरोसे भाजपा
भाजपा का मानना है कि उसने जिस तरह कर्नाटक में टिकटों को बांटने में लिंगायत, वोक्कालिगा, अनुसूचित जाति और जनजातीय समुदायों को पर्याप्त हिस्सेदारी दी है, उससे राज्य में नए समीकरण पैदा हुए हैं। ये समीकरण उसे सत्ता में दोबारा लाने में सफल रहेंगे। जनता ने किस दल के समीकरणों पर भरोसा जताया है, यह 13 मई को ही पता चलेगा जब चुनाव परिणाम सामने आएंगे।