बहुमत परीक्षण में विफल रही भाजपा को शनिवार को कर्नाटक विधानसभा में मुंह की खानी पड़ी। लोकसभा चुनाव के बाद पहली बार भाजपा ने रणनीति के मामले में मुंहकी खाई, मिजोरम, मेघालय, गोवा में दिखाया गया चमत्मकार कर्नाटक में हुआ फेल हो गया, सुप्रीम कोर्ट से बहुमत परीक्षण के लिए ज्यादा समय न मिलने से भाजपा की रणनीति गड़बड़ा गई। या ये कहा जाए कि समय रहते कांग्रेस के सतर्क होने से भाजपा का समीकरण गड़बड़ा गया।
हालांकि यह पहली बार नहीं जब भारतीय राजनीति में बहुमत परीक्षण का मौका पहली बार देखने को मिला हो। आइए जानते हैं वो मौके जब विभिन्न दलों को बहुमत परीक्षण की अग्निपरीक्षा से गुजरना पड़ा:-
1. 1979- 15 दिनों में ही गिर गई चरण सिंह की सरकार
आपातकाल के बाद संकट में घिरीं इंदिरा गांधी ने लोकसभा भंग कर चुनाव कराने के सिफारिश की। केंद्र में 30 वर्ष बाद किसी गैर-कांग्रेसी दल की सरकार बनी थी कांग्रेस को चुनाव के दौरान आपातकाल लागू करना भारी पड़ गया था। जिसके बाद जनता पार्टी बहुमत के साथ सत्ता में आई और मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री के कुर्सी पर काबिज हुए। उनके मंत्री मंडल में चौधरी चरण सिंह गृहमंत्री और उप-प्रधानमंत्री नियुक्त हुए। लेकिन समय को कुछ और ही मंजूर था।
पार्टी में अंदरूनी कलह और गुटबाजी के चलते मोरारजी सरकार गिर गई। जिसके बाद चौधरी चरण सिंह ने कांग्रेस और सीपीआई के समर्थन से 28 जुलाई 1979 को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। लेकिन बहुमत परीक्षण से पहले कांग्रेस ने समर्थन वापस लेने की घोषणा कर दी और उनकी सरकार गिर गई और उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा।
2. रथ यात्रा थमी, सरकार गिरी
1988 में जनमोर्चा, जनता पार्टी, लोकदल और कांग्रेस (एस) का ने हाथ मिलाया और एक नई पार्टी जनता दल का गठन हुआ। और वीपी सिंह को इसका अध्यक्ष नियुक्त किया गया। इस बैनर तले कई क्षेत्रीय दल भी शामिल हुए और नेशनल फ्रंट का गठन किया। 1989 में आम चुनाव हुए नेशनल फ्रंट को सफलता मिली लेकिन यह सफलता आधी-अधूरी थी। हालांकि भाजपा और वाम पार्टियों के समर्थन से सरकार बना ली और प्रधानमंत्री बने वीपी सिंह।
सब सही चल ही रहा था कि एक साल बाद भाजपा ने रथ यात्रा शुरू की। जो कि कई राज्यों से होते हुए बिहार पहुंची तो राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू यादव ने लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा रोक दी और उन्हें गिरफ्तारी भी की गई। भाजपा के शीर्ष नेता के साथ इस तरह का बर्ताव देख पार्टी आलाकमान बेहद नाराज हुए और उन्होंने अपना समर्थन वापस ले लिया और वीपी सिंह को प्रधानमंत्री की कुर्सी से हाथ धोना पड़ा।
3. 1990 में राजीव गांधी की जासूसी पर गिरी थी सरकार
1990 चंद्रशेखर सिंह ने कांग्रेस के समर्थन से प्रधानमंत्री बनने के बाद से चार महीने तक सरकार चलाई थी लेकिन राजीव गांधी की जासूसी करने के आरोप में कांग्रेस ने चंद्रशेखर सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया था। उस समय हरियाणा पुलिस के दो कांस्टेबल राजीव गांधी के घर के पास से जासूसी करने के आरोप में पकड़े गए थे। जिसके बाद दोनों पुलिस अधिकारियों ने यह बात कबूल की थी उन्हें राजीव गांधी की जासूसी के लिए भेजा गया था। इस कबूलनामे के बाद चंद्रशेखर को पीएम पद से इस्तीफा देना पड़ा। जिसके बाद बहुमत परीक्षण के दौरान विफल होने पर चंद्रशेखर ने इस्तीफे की घोषणा कर दी।
4. जब भाजपा ने बसपा को दिया समर्थन
बात 1993 की है जब समाजवादी पार्टी ने बहुजन समाज पार्टी को समर्थन का ऐलान कर मिलकर सरकार बनाई। तब बसपा के अध्यक्ष कांशीराम थे तो सपा के मुलायम सिंह यादव। लेकिन आपसी कलह के बीच और सत्ता में बढ़ती पॉवर की भूख की वजह से यह गठबंधन महज 2 साल ही चल सका और सपा-बसपा सरकार गिर गई। यहां सपा ने बसपा से समर्थन वापस लिया था। जिसके बाद बसपा ने बहुमत परीक्षण में भाजपा के समर्थन से सरकार बनाई। और सपा ने सत्ता से बाहर होकर खुद को हाशिये पर ला खड़ा किया।
5. एक वोट पड़ा भारी
साल 1998 की बात है। इस समय गठबंधन सरकारों का सफल दौर शुरु हुआ ही था। वाजपेयी जी 13 महीने की सरकार चला चुके थे कि तभी अन्नाद्रमुक ने राजग सरकार से समर्थन वापस करने का फैसला किया। समर्थन वापसी के बाद विश्वास मत पर मतदान हुआ और वाजपेयी जी एक वोट से हार गए। और वह वोट था ओडिशा के मुख्यमंत्री गिरधर गमांग का।