पहले ही मिल चुका है फायदा
पृथ्वीदत्ता कहते हैं, 'कुमारस्वामी इस मुद्दे का विरोध कर चुके हैं इसलिए जेडीएस के लिए इसे उठाने का ज्यादा मतलब नहीं है। इस पार्टी ने कांग्रेस की तरह टीपू जयंती की भव्यता पर भी ज्यादा जोर नहीं दिया है।कांग्रेस के डॉक्टर जी परमेश्वर (उपमुख्यमंत्री) के लिए भी ये उतना मायने नहीं रखता जितनी इसकी अहमियत सिद्धारमैया के लिए थी।'
उन्होंने कहा, 'जिस लाभ की उन्होंने उम्मीद लगाई थी वो पहले ही मिल चुका है। अब हासिल करने के लिए ज्यादा कुछ नहीं है। अब सिर्फ राजनीतिक दिखावे की ही बात है। जेडीएस और कांग्रेस हाथ मिला चुके हैं और उन्हें वोटों के बंटवारे का खतरा नहीं है। इस परिस्थिति में कुछ करना राजनीतिक जोखिम लेने की तरह होगा ।'
पृथ्वीदत्ता उस राय को ठीक नहीं मानते जिसमें कहा जा रहा है कि टीपू जयंती समारोह से जेडीएस के वोक्कालिगा समुदाय के समर्थन पर असर हो सकता है। इस समुदाय को एचडी देवेगौड़ा और एचडी कुमारस्वामी का मजबूत समर्थक माना जाता है।
क्यों बदली रणनीति?
लेकिन इस मुद्दे पर प्रोफेसर रामास्वामी का नजरिया अलग है। वो कहते हैं, 'ऐसा नहीं है कि टीपू सुल्तान मुद्दे से राजनीतिक दलों को लाभ नहीं मिला हो।अब कांग्रेस और जेडीएस दोनों ही अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण के आरोप झेलने से बचना चाहती हैं। बीजेपी भी ऐसी राय नहीं बनने देना चाहती है कि वो लोगों को बांट रही है क्योंकि वो बहुसंख्यक वोटों को एकजुट करना चाहती है। पुराने मैसूर इलाके के लोग जानते हैं कि टीपू ने मंदिरों के विकास में भी खासी मदद की थी। इसलिए टीपू मुद्दा नहीं बन सकते।'
बीजेपी ने टीपू सुल्तान को हमेशा ही धार्मिक तौर पर कट्टर शख्सियत के तौर पर पेश किया है। लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने पत्रकारों से कहा, 'अंग्रेजों के खिलाफ चार जंग लड़ीं।वो अच्छे प्रशासक थे।उनके मुख्यमंत्री कौन थे? एक ब्राह्मण पुरनिया। उनका वित्तमंत्री एक हिंदू था। कौन कह सकता है कि वो हिंदुओं के विरोधी थे जबकि उन्होंने श्रीरंगपट्टनम और श्रृंगेरी के मंदिरों को धन दिया। रेशम भी उन्हीं के शासन में विकसित हुआ।'