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कर्नाटक: क्यों ठंडा पड़ा टीपू सुल्तान के नाम पर दिखने वाला उन्माद?

Sun, 11 Nov 2018 12:51 PM IST
बीबीसी हिंदी
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टीपू सुल्तान - फोटो : File Photo
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कर्नाटक में सत्ता समीकरण बदलते ही उस उन्माद पर ठंडा पानी पड़ गया लगता है, जो बीते चार साल के दौरान टीपू सुल्तान की जयंती के मौके पर होने वाले जश्न और विरोध को लेकर दिखता था।राज्य में राजनीतिक समीकरण बदलने का असर सुरक्षा इंतजामों पर भी दिखा।

टीपू सुल्तान की जयंती पर कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए 57 हजार पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया। इनमें से करीब तीन हजार पुलिसकर्मी राज्य की राजधानी बेंगलुरू में तैनात किए गए। मुख्यमंत्री और जनता दल (सेक्युलर) के नेता एचडी कुमारस्वामी राज्य सचिवालय में हुए मुख्य कार्यक्रम में मौजूद नहीं थे। उन्होंने अपनी गैरमौजूदगी की वजह स्वास्थ्य कारणों को बताया।

कार्यक्रम के आधिकारिक निमंत्रण पत्र में भी उनके नाम का जिक्र नहीं था। कुमारस्वामी के पहले कांग्रेस नेता सिद्धारमैया कर्नाटक के मुख्यमंत्री थे और वो हर बार कार्यक्रम में मौजूद रहते थे।

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'अंधविशवास पर यकीन नहीं'
कुमारस्वामी की गैरमौजूदगी को लेकर आलोचकों ने बीते सालों के उनके बयान को याद दिलाया जब वो कहा करते थे, 'जन्मदिन मनाने से समाज को कोई फायदा नहीं होगा' । आलोचनाओं का पूर्वानुमान लगाते हुए कुमारस्वामी ने टीपू सुल्तान के प्रगतिशील कामों और नई खोज के लिए उनकी कोशिशों की सराहना की।

कुमारस्वामी ने एक बयान में कहा, '(डॉक्टर की सलाह पर कार्यक्रम में हिस्सा नहीं लेने का) कोई विशेष अर्थ खोजना अनावश्यक होगा । इस बात में कोई सत्यता नहीं है कि ऐसा मैं इस डर से कर रहा हूं कि मेरी कुर्सी चली जाएगी। मेरा अंधविश्वासों में कोई यकीन नहीं है।' भारतीय जनता पार्टी हमेशा टीपू सुल्तान की जयंती पर होने वाले कार्यक्रमों का जोरदार विरोध करती रही थी, लेकिन इस बार उनके प्रदर्शनों में भी वो धार नहीं दिखी।

राजधानी बेंगलुरू में कार्यक्रम के एक दिन पहले छोटा प्रदर्शन हुआ। भारतीय जनता पार्टी की राजनीति के लिहाज से अहम कोडागू और मैसूर जिलों में भी अमूमन शांति रही। सिर्फ मुट्ठीभर लोगों ने टीपू सुल्तान के खिलाफ़ नारेबाजी की।

'सरकार के दोहरे मानदंड'
टीपू सुल्तान ने साल 1766 में अपने पिता हैदर अली के साथ अंग्रेजों के खिलाफ मैसूर की पहली जंग में हिस्सा लिया था। उस वक्त उनकी उम्र 15 साल थी।  साल 1799 में श्रीरंगपट्टनम की चौथी जंग के दौरान युद्ध के मैदान में उनकी मौत हुई थी। भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता एस प्रकाश ने कहा, 'विरोध के सुर धीमे करने की बात नहीं है ऐसा नहीं है कि हम टीपू का विरोध करते हैं तो हम बंद बुलाएं और कानून-व्यवस्था की दिक्कत पैदा हो।

हम सिर्फ इस सरकार के दोहरे मानदंड उजागर करना चाहते हैं। मुख्यमंत्री खुद उपस्थित नहीं थे और कांग्रेस पार्टी से आने वाले उपमुख्यमंत्री विदेश चले गए।'अब सवाल ये है कि क्या राजनीतिक दलों के लिए टीपू सुल्तान का नाम वोट दिलाने वाला नहीं रहा? मैसूर में रहने वाले इतिहासकार पृथ्वीदत्ता चंद्र शोबी ने बीबीसी से कहा, 'ऐसा ही लगता है। धारवाड़ विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर हरीश रामास्वामी कहते हैं, 'दोनों ही पक्ष विवादों से बचने की कोशिश में हैं'।

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टीपू सुल्तान

 पहले ही मिल चुका है फायदा
पृथ्वीदत्ता कहते हैं, 'कुमारस्वामी इस मुद्दे का विरोध कर चुके हैं इसलिए जेडीएस के लिए इसे उठाने का ज्यादा मतलब नहीं है। इस पार्टी ने कांग्रेस की तरह टीपू जयंती की भव्यता पर भी ज्यादा जोर नहीं दिया है।कांग्रेस के डॉक्टर जी परमेश्वर (उपमुख्यमंत्री) के लिए भी ये उतना मायने नहीं रखता जितनी इसकी अहमियत सिद्धारमैया के लिए थी।'

उन्होंने कहा, 'जिस लाभ की उन्होंने उम्मीद लगाई थी वो पहले ही मिल चुका है। अब हासिल करने के लिए ज्यादा कुछ नहीं है। अब सिर्फ राजनीतिक दिखावे की ही बात है। जेडीएस और कांग्रेस हाथ मिला चुके हैं और उन्हें वोटों के बंटवारे का खतरा नहीं है। इस परिस्थिति में कुछ करना राजनीतिक जोखिम लेने की तरह होगा ।'

पृथ्वीदत्ता उस राय को ठीक नहीं मानते जिसमें कहा जा रहा है कि टीपू जयंती समारोह से जेडीएस के वोक्कालिगा समुदाय के समर्थन पर असर हो सकता है। इस समुदाय को एचडी देवेगौड़ा और एचडी कुमारस्वामी का मजबूत समर्थक माना जाता है।

 क्यों बदली रणनीति?
लेकिन इस मुद्दे पर प्रोफेसर रामास्वामी का नजरिया अलग है। वो कहते हैं, 'ऐसा नहीं है कि टीपू सुल्तान मुद्दे से राजनीतिक दलों को लाभ नहीं मिला हो।अब कांग्रेस और जेडीएस दोनों ही अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण के आरोप झेलने से बचना चाहती हैं। बीजेपी भी ऐसी राय नहीं बनने देना चाहती है कि वो लोगों को बांट रही है क्योंकि वो बहुसंख्यक वोटों को एकजुट करना चाहती है। पुराने मैसूर इलाके के लोग जानते हैं कि टीपू ने मंदिरों के विकास में भी खासी मदद की थी। इसलिए टीपू मुद्दा नहीं बन सकते।'

बीजेपी ने टीपू सुल्तान को हमेशा ही धार्मिक तौर पर कट्टर शख्सियत के तौर पर पेश किया है। लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने पत्रकारों से कहा, 'अंग्रेजों के खिलाफ चार जंग लड़ीं।वो अच्छे प्रशासक थे।उनके मुख्यमंत्री कौन थे? एक ब्राह्मण पुरनिया। उनका वित्तमंत्री एक हिंदू था। कौन कह सकता है कि वो हिंदुओं के विरोधी थे जबकि उन्होंने श्रीरंगपट्टनम और श्रृंगेरी के मंदिरों को धन दिया। रेशम भी उन्हीं के शासन में विकसित हुआ।'

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