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वीरता की अद्भुत मिसाल कायम कर गए मनोज कुमार पांडे, पढ़ें कैसे उड़ाये थे दुश्मनों के बंकर

Wed, 25 Jul 2018 05:19 AM IST
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली
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भारत देश के वीर नौजवानों ने समय-समय पर ऐसे अदम्य साहस का परिचय दिया है जिसे सुनकर लोग दांतों तले उंगली दबा लेते हैं। कारगिल युद्ध के हीरो रहे मनोज कुमार पांडे ने भी वीरता की ऐसी वीरगाथा लिखी कि जिसे पढ़कर किसी भी भारतीय का सीना चौड़ा हो जाए। 

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भारतीय थल सेना अध्यक्ष (भूतपूर्व) जनरल वीपी मलिक ने अपनी पुस्तक 'कारगिल : एक अभूतपूर्व विजय' में लिखा है कि लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडे की टीम 1/11 गोरखा राइफल्स को कारगिल के खालूबार क्षेत्र में दुश्मन के ठिकानों को खत्म करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। दुश्मन ने इस क्षेत्र में चार बंकर बना रखे थे। पाक सेना का बंकर ऊंची चोटी पर था जिससे वे रह-रहकर गोलीबारी कर रहे थे। ऐसे में उन पर हमला करना मुश्किल हो गया था। दिन के समय चोटी पर चढ़ाई की नहीं जा सकती थी। इसलिए मनोज कुमार पांडे ने रात के समय चोटी पर चढ़कर उसे नेस्तनाबूद करने की योजना बनाई। 

योजना के मुताबिक दो-तीन जुलाई 1999 की रात को चढ़ाई करनी शुरू कर दी। लेकिन पाक टीम को इसकी जानकारी हो गई और वे तेज गोलीबारी करने लगे। इसके बाद मनोज कुमार पांडे ने सूझबूझ दिखाई और सबसे पहले अपनी टीम को सुरक्षित जगह पर ले गए। इसके कुछ ही देर बाद उन्होंने एक योजना के मुताबिक अपनी टीम को दो हिस्सों में बांटा। एक टुकड़ी को उन्होंने दाहिने ओर से हमला करने के लिए भेज दिया जबकि दूसरी टुकड़ी का खुद नेतृत्व किया और बाईं ओर से चढ़ाई शुरू कर दी। 
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कुछ ही देर बाद वे पाकिस्तान की चौकियों के करीब पहुंच गए। पाकिस्तान के दो सैनिकों को गोली मारकर उन्होंने उन्हें मौत के घाट उतार दिया और पहले संगर को खाली करा दिया। लेकिन इस गोलीबारी से पाकिस्तानी सेना चौकन्नी हो गई और उन्होंने फिर तेज गोलाबारी शुरू कर दी। इस गोलाबारी के बीच पांडे ने अपना रास्ता बनाया और दूसरे बंकर के पास भी दो पाकिस्तानी जवानों को मौत के घाट उतारकर उस पर कब्जा कर लिया। 

जब वे तीसरे संगर को नष्ट करने जा रहे थे उसी समय दुश्मन सेना की गोली आकर उन्हें लग गई। उनके कंधे और पैर बुरी तरह जख्मी हो गए। लेकिन मनोज कुमार पांडे ने हिम्मत नहीं हारी और आगे बढ़ने लगे। तीसरे संगर के पास खड़े पाक सैनिकों को मार गिराया। पैरों में गम्भीर जख्म होने के बाद भी वो खुद चौथे संगर को भी नष्ट करने के लिए आगे बढ़ने लगे। 

चौथे संगर को नष्ट करने के लिए जब उन्होंने हाथ से गोला फेंका, ठीक उसी समय पाकिस्तानी मशीन गन से निकला एक गोला सीधे उनके सिर के करीब आकर फट गया जिससे वे मौके पर ही शहीद हो गए। शहीद होने के पहले माँ भारती के इस अमर सपूत ने अपनी टीम को दी गई जिम्मेदारी का निर्वहन किया और चारों बंकरों को नष्ट कर दिया। 
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पाकिस्तानी थे बेहाल

जनरल मलिक का कहना है कि जब वार खत्म हो गया तब उन्होंने पाकिस्तानी सैनिकों की आपसी बातचीत के टेप सुने थे। टेप में पाकिस्तानी सेना के जवान उनके बंकरों में खाने-पीने की चीजें न होने की शिकायत कर रहे थे। जब भारतीय सेना ने मनोज कुमार पांडे के जीते इन बंकरों का निरीक्षण किया तब पता चला कि उनके पास अमेरिकी स्टिंगर प्रक्षेपास्त्र मौजूद थे। उन्हें भारी मात्रा में गोला बारूद और हथियार छोड़कर भागना पड़ा था। जनरल वीपी मलिक लिखते हैं कि मनोज कुमार पांडे के इस शौर्य के लिए उन्हें परमवीर चक्र प्रदान किया गया। 

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