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कन्याकुमारी गंभीर राजनीतिक संघर्ष का केंद्र, चार चुनाव से हर बार बदलते रहे हैं सांसद

Mon, 15 Apr 2019 06:27 AM IST
गौरव द्विवेदी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कन्याकुमारी
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Kanyakumari (file)
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तमिलनाडु की कन्याकुमारी एकमात्र ऐसी लोकसभा सीट है, जिस पर भाजपा का कब्जा है और कांग्रेस व द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (डीएमके) इसे छीनने के लिए पूरा जोर लगाए हुए हैं। इस सीट की खास बात यह है कि यहां पिछले चार चुनावों से मौजूदा सांसद को पराजय ही मिली। बीते लोकसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी को 2.44 और डीएमके उम्मीदवार को 1.17 लाख वोट मिले थे। दोनों के वोट मिलाकर भी भाजपा के विजयी प्रत्याशी पोन राधाकृष्णन के 3.72 लाख वोट से 11 हजार कम हैं। बीते चारों चुनावों के मौजूदा सांसदों की हार ही गठबंधन की उम्मीद बढ़ाए हुए है। पोन कृष्णन इस बार भी मैदान में हैं, तो कांग्रेस ने प्रदेश उपाध्यक्ष एच वसंतकुमार को उतारा है।

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वर्ष 2014 में भाजपा ने तमिलनाडु की 39 लोकसभा सीटों के लिए पट्टाली मक्कल काच्चि (पीएमके) से गठबंधन किया था। दोनों ने एक-एक सीट जीती थी। पीएमके को उत्तरी तमिलनाडु में मजबूत माना जाता है, ऐसे में कन्याकुमारी में वह भाजपा के बहुत काम नहीं आने वाली है। भाजपा को ज्यादा भरोसा अपने प्रत्याशी पर है। अमित शाह ने तुतुकुड़ी में कुछ दिन पहले चुनावी जनसभा में पोन राधाकृष्णन को न केवल दक्षिण में अपना प्रतिनिधि बताया, बल्कि उन्हें मंत्री पद देकर केंद्रीय राजनीति में दक्षिण भारतीय प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने का भी दावा किया। वे 1999 की एनडीए सरकार में भी मंत्री थे। पेशे से वकील और आरएसएस से जुड़े राधाकृष्णन अविवाहित हैं। 

कांग्रेस ने 13 बार जीती यह सीट

कन्याकुमारी 2008 से पहले नागरकोइल सीट के रूप में जानी जाती थी। प्रदेश के पहले सीएम के. कामराज नाडार यहीं से दो बार लोकसभा पहुंचे। 1977 को अपवाद स्वरूप छोड़ दें, तो 1951 से 1991 तक यह सीट 13 बार कांग्रेस ने जीती। 1977 में कांग्रेस से टूटकर बने आईएनसीओ से कुमारी अनंतन ने कांग्रेस के एम. मोसेस को हराया। 1996 में यह सीट कांग्रेस से टूटकर बनी तमिल मनीला कांग्रेस (मूपनार) के एन. डेनिस ने जीती। इसके बाद यहां कभी कांग्रेस की वापसी नहीं हुई। 1998 में डेनिस, 1999 में पोन राधाकृष्णन, 2004 में सीपीएम के एवी बेल्लारमिन जीते। 2008 में सीट को कन्याकुमारी नाम दिया गया। नए नाम से 2009 में हुए चुनाव में डीएमके के जे. हेलन डेविडसन ने जीत हासिल की। 2014 में भाजपा की वापसी हुई जब पोन राधाकृष्णन ने जीत हासिल की।
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मुकाबला भाजपा-भाजपा प्रदेशाध्यक्ष के चाचा में

भाजपा से फिर पोन राधाकृष्णन मैदान में हैं, तो डीएमके-कांग्रेस गठबंधन ने कांग्रेस के प्रदेश उपाध्यक्ष एच वसंतकुमार को मुकाबले में उतारा है। वसंतकुमार भाजपा की प्रदेश अध्यक्ष डॉ. तमिलीसाई सुंदराजन के चाचा भी है। उनके लिए यह मुकाबला पिछली हार का हिसाब चुकाने का मौका है।

अल्पसंख्यक बंटे तो भाजपा को फायदा

इस सीट पर 48.6 प्रतिशत आबादी हिंदू और 46.8 प्रतिशत ईसाई धर्म मानने वाली है। बाकी मुख्यत: मुस्लिम हैं। भाजपा की यहां दो बार जीत की प्रमुख वजह अल्पसंख्यकों के वोट बंटने को माना जाता है। यहां की बड़ी आबादी मछली से जुड़े कारोबार पर निर्भर है। इनमें अधिकतर मछुआरे हैं। यहां इनायम क्षेत्र में सांसद द्वारा कंटेनर टर्मिनल बनाया जा रहा, जिससे इस कारोबार को खतरा माना जा रहा है। मछुआरों ने इसका कड़ा विरोध किया है। 

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