कांवड़ यात्रा की कहानी: पुराणों में क्या है इससे जुड़ी मान्यताएं, कहां-कहां से निकलती है, कब से हुई शुरुआत?
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Fri, 11 Jul 2025 09:10 PM IST
सार
कांवड़ यात्रा होती क्या है? इस यात्रा से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं और इतिहास क्या है? यह यात्रा कहां से शुरू होती है और किन-किन मार्गों से होते हुए कहां पहुंचती है? इनमें सबसे लोकप्रिय कांवड़ यात्रा कहां होती है? आइये जानते हैं...
सावन के पावन माह की शुरुआत के साथ ही कांवड़ यात्रा आज से शुरू हो गई है। इस पूरे माह लाखों की संख्या में केसरिया वस्त्र धारण कर कांवड़िए अलग-अलग स्थानों से गंगा नदी का पवित्र जल लेकर भगवान शिव के ज्योतिर्लिंगों और लोकप्रिय मंदिरों में पहुंचेंगे और जलाभिषेक करेंगे। उत्तर प्रदेश से लेकर बिहार और झारखंड तक अलग-अलग सरकारों ने कांवड़ियों की सुरक्षा के लिए जबरदस्त इंतजाम किए हैं। साथ ही कांवड़ यात्रा के मार्ग पर लगातार चौकसी रखी जा रही है।
इस बीच यह जानना अहम है कि आखिर कांवड़ यात्रा होती क्या है? इस यात्रा से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं और इतिहास क्या है? यह यात्रा कहां से शुरू होती है और किन-किन मार्गों से होते हुए कहां पहुंचती है? इनमें सबसे लोकप्रिय कांवड़ यात्रा कहां होती है? आइये जानते हैं...
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कांवड़ यात्रा के दौरान शिव भक्त
- फोटो : अमर उजाला
सावन के पावन माह की शुरुआत के साथ ही कांवड़ यात्रा आज से शुरू हो गई है। इस पूरे माह लाखों की संख्या में केसरिया वस्त्र धारण कर कांवड़िए अलग-अलग स्थानों से गंगा नदी का पवित्र जल लेकर भगवान शिव के ज्योतिर्लिंगों और लोकप्रिय मंदिरों में पहुंचेंगे और जलाभिषेक करेंगे। उत्तर प्रदेश से लेकर बिहार और झारखंड तक अलग-अलग सरकारों ने कांवड़ियों की सुरक्षा के लिए जबरदस्त इंतजाम किए हैं। साथ ही कांवड़ यात्रा के मार्ग पर लगातार चौकसी रखी जा रही है।
इस बीच यह जानना अहम है कि आखिर कांवड़ यात्रा होती क्या है? इस यात्रा से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं और इतिहास क्या है? यह यात्रा कहां से शुरू होती है और किन-किन मार्गों से होते हुए कहां पहुंचती है? इनमें सबसे लोकप्रिय कांवड़ यात्रा कहां होती है? आइये जानते हैं...
पहले जानें- कांवड़ यात्रा कहां से शुरू होती है?
कांवड़ यात्रा हर वर्ष सावन के महीने में शुरू होती है। इस साल यह यात्रा 11 जुलाई से शुरू हो रही है। इस यात्रा में केसरी वस्त्र में कांवड़िए नंगे पैर चलकर उत्तर और पूर्व भारत में गंगा नदी से जल लेकर भगवान शिव के मंदिरों और ज्योतिर्लिंगों में चढ़ाते हैं। कांवड़िए गंगा नदी से जल लेने के लिए बड़ी संख्या में उत्तराखंड के गौमुख, गंगोत्री और हरिद्वार पहुंचते है। इसके अलावा उत्तर प्रदेश के प्रयागराज, वाराणसी में भी जल लेने के लिए कांवड़िए पहुंचते हैं। बिहार का सुल्तानगंज भी कांवड़ियों के जल लेने का ऐसा ही एक केंद्र है।
इसके अलावा कांवड़िए बाराबंकी और अयोध्या से बहने वाली घाघरा नदी (जिसे सरयू नदी के नाम से भी जाना जाता है) से भी जल लेकर भगवान शिव के प्रमुख ज्योतिर्लिंगों और मंदिरों में जल अर्पित करने के लिए पहुंचते हैं।
कांवड़ यात्रा कहां से होकर गुजरती है, प्रमुख स्थान कौन से हैं?
कांवड़ यात्रा अधिकतर कई किलोमीटर की होती है। जहां उत्तर भारत में पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में रहने वाले लोग गंगाजल लेने के लिए उत्तराखंड में गंगा नदी से जल लेने पहुंचते हैं तो वहीं अवध क्षेत्र और पूर्वी भारत में भक्त प्रयागराज, वाराणसी और अयोध्या या आसपास के क्षेत्रों से जल लेते हैं। बिहार के भागलपुर जिले में आने वाले सुल्तानगंज से भी गंगाजल लेने हजारों की संख्या में कांवड़िए पहुंचते हैं।
गंगाजल को लेकर कहां-कहां पहुंचते हैं कांवड़िए?
कांवड़िए एक लंबी और दुष्कर यात्रा को गंगा नदी के करीब मौजूद ज्योतिर्लिंग और प्रचलित मंदिरों में शिवलिंग को अर्पित करते हैं। जहां उत्तर भारत के लोग इस जल को मेरठ में पड़ने वाले मंदिरों- औघड़नाथ मंदिर, पुरा महादेव (मेरठ), दुधेश्वर नाथ मंदिर (गाजियाबाद) में अर्पित करते हैं तो वहीं अवध क्षेत्र और पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के लोग जल को बाराबंकी स्थित लोधेश्वर महादेव मंदिर, अयोध्या के क्षीरेश्वर महादेव मंदिर में चढ़ाते हैं।
इसके अलावा दो अहम ज्योतिर्लिंग- बनारस में मौजूद काशी विश्वनाथ मंदिर और झारखंड के देवघर में बाबा बैद्यनाथ मंदिर में देशभर से जलाभिषेक के लिए आने वाले कांवड़ियों की भारी भीड़ जुटती है। कुछ कांवड़िए इस यात्रा में झारखंड के दुमका जिले में स्थित बाबा बासुकीनाथ धाम भी जाते हैं।
कांवड़ियों के लिए कौन से मार्ग तय हैं?
कांवड़ यात्रा के लिए उत्तर प्रदेश एक मुख्य केंद्र है। यहां कांवड़िये पश्चिमी यूपी के मुजफ्फरनगर, बागपत, मेरठ, बुलंदशहर, गाजियाबाद से लेकर अवध के लखनऊ, बाराबंकी होते हुए पूर्वी यूपी के मिर्जापुर तक से अहम मंदिरों तक जाते हैं। इस दौरान उत्तर प्रदेश में कांवड़िए अधिकतर दिल्ली-मुरादाबाद राष्ट्रीय राजमार्ग-24, हापुड़-मुजफ्फरनगर से होते हुए दिल्ली-रुड़की राष्ट्रीय राजमार्ग-58 के जरिए जाते हैं। इसके अलावा दिल्ली-अलीगढ़ राष्ट्रीय राजमार्ग-91, अयोध्या-गोरखपुर राजमार्ग और प्रयागराज-वाराणसी हाईवे भी कांवड़ियों के मार्गों में शामिल हैं। इन सभी क्षेत्रों में उत्तर प्रदेश सरकार ने सुरक्षा के जबरदस्त इंतजाम किए हैं।
कांवड़ क्या होता है?
गंगा नदी से पानी लेने के बाद कांवड़िए लकड़ी की बनी कांवड़ कंधे पर उठाते हैं और इसके जरिए गंगा का पानी लेकर भगवान शिव के प्रसिद्ध मंदिरों और ज्योतिर्लिंगों की यात्रा करते हैं। इसी जल से बाद में भगवान शिव का अभिषेक किया जाता है। इसके अलावा कांवड़िए अपने गांव या शहर में मौजूद भगवान शिव के मंदिर में भी जलाभिषेक करते हैं।
पहले की कांवड़ यात्रा के मुकाबले अब क्या नियम?
कांवड़ को लेकर कुछ सख्त नियम भी हैं। जैसे- एक बार जल लेकर कंधे पर उठाए जाने के बाद कांवड़ को जमीन पर नहीं रखा जाता है। हालांकि, इन नियमों में पहले के मुकाबले कुछ ढील भी दी गई है। इसके अलावा पहले एक-दो या चार लोग ही साथ में कांवड़ लेकर निकलते थे। हालांकि, बीते वर्षों में कुछ हादसों और बाधाओं के मद्देनजर अब इस यात्रा को नियमति करने के लिए कांवड़िए चार-पांच टोलियां बनाकर चलते हैं। इससे रास्ते में किसी कांवड़िए को परेशानी होने की स्थिति में बाकी लोग कांवड़ का ध्यान रखते हैं।
क्या है कांवड़ यात्रा से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं?
कांवड़ यात्रा का पूरा इतिहास पौराणिक काल का है। मान्यता है कि इसका आधार 'समुद्र मंथन' से है, जिसका जिक्र विष्णु पुराण में मिलता है। जब देवताओं और असुरों ने अमृत पाने के लिए समुद्र का मंथन किया था। इस दौरान मंथन में हलाहल या विष भी निकला था। इस हलाहल से जब धरती में आग लगने लगी, तब भगवान शिव ने इस विष को पी लिया, ताकि इसे फैलने से रोका जा सके। जैसे ही भगवान शिव ने विष पीया, देवी पार्वती ने उनके कंठ को पकड़ लिया, ताकि विष को वहीं रोका जा सके और भगवान के अंदर मौजूद विश्व को प्रभावित होने से रोका जा सके। भगवान शिव का गला इस विष की वजह से नीला पड़ गया, जिसके बाद उन्हें नीलकंठ (जिसका कंठ नीला हो) कहा गया।
लेकिन इसके बावजूद विष का प्रभाव उनके पूरे शरीर पर हुआ। मान्यता है कि विष के इसी प्रभाव को कम करने के लिए कांवड़िए हर वर्ष सावन के महीने में भगवान शिव के मंदिरों और ज्योतिर्लिंगों में पहुंचकर जलाभिषेक करते हैं।
रावण, परशुराम और भगवान राम से भी जुड़ी है कांवड़ की पौराणिक मान्यता
भगवान शिव द्वारा विष पिए जाने के बाद इसका प्रभाव उनके शरीर पर पड़ा। इसके बाद की कहानी पहुंचती है त्रेता युग, जब प्रभु के अनन्य भक्त रावण ने भगवान शिव की साधना की और ध्यान लगाया। इस दौरान रावण ने पुरा महादेव में शिवलिंग पर पवित्र गंगाजल चढ़ाया, जिससे भगवान शिव विष के नकारात्मक असर से मुक्त हो गए। माना जाता है कि शिवलिंग पर जल चढ़ाने की शुरुआत यहीं से हुई।
एक और मान्यता भगवान परशुराम से जुड़ी हुई है। भगवान शिव के भक्त परशुराम को ही कांवड़ यात्रा की शुरुआत करने वाला भी माना जाता है। मान्यता है कि जब भगवान शिव की उपासना के लिए परशुराम पुरा के पास थे, तो यहां उन्हें प्रभु का मंदिर बनाने का ख्याल आया। इसके बाद वे सावन में हर सोमवार को गंगाजल लाकर भगवान शिव की साधना करते थे।
एक अन्य मान्यता के अनुसार भगवान श्रीराम ने भी कांवड़ यात्रा की थी। कहा जाता है कि उन्होंने बिहार के सुल्तानगंज से गंगाजल भरकर देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम में शिवलिंग का जलाभिषेक किया था। इसे भी कांवड़ यात्रा के शुरुआती चरणों में से माना जाता है।
इस बार कांवड़ यात्रा की सुरक्षा के क्या इंतजाम?
बताया गया है कि कांवड़ यात्रा की सुरक्षा के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने इस बार महाकुंभ की तर्ज पर इंतजाम किए हैं। डीजीपी राजीव कृष्ण के निर्देश पर कांवड़ यात्रा के लिए 70 हजार से अधिक सुरक्षाकर्मियों की तैनाती की गई है। साथ ही, यात्रा मार्ग की चप्पे-चप्पे की निगरानी 29,454 सीसीटीवी और 395 ड्रोन से की जाएगी। इसके अलावा 1222 पुलिस सहायता केंद्र एवं कंट्रोल रूम के साथ 1,845 जल सेवा केंद्र और 829 चिकित्सा शिविर का भी इंतजाम किया गया है।
इसके अलावा पुलिस अधिकारियों से लेकर थाना प्रभारियों तक के मोबाइल नंबर, यातायात डाइवर्जन स्कीम एवं अन्य महत्वपूर्ण सूचनाएं बारकोड के जरिए अखबारों में विज्ञापन, होर्डिंग, सोशल मीडिया आदि के जरिए श्रद्धालुओं को उपलब्ध कराई जा रही है। सभी यात्रा मार्गों की सीसीटीवी, ड्रोन एवं टीथर्ड ड्रोन से निगरानी होगी, जिससे प्राप्त वीडियो लिंक की मुख्यालय स्तर से रियल टाइम मॉनीटरिंग होगी।
उत्तराखंड, हरियाणा, दिल्ली एवं राजस्थान के साथ समन्वय के लिए व्हाट्सएप ग्रुप बना है, जिस पर रियल-टाइम सूचनाओं का आदान-प्रदान, मार्गों की स्थिति, सुरक्षा व्यवस्था, भीड़ नियंत्रण आदि सूचनाएं तत्काल साझा की जाएंगी। विभिन्न राजमार्गों को सामान्य यातायात के लिए कुछ दिनों तक प्रतिबंधित किया गया है। विभिन्न राजमार्गो, टोल बैरियर पर यात्रा के मूवमेंट की योजना बनाकर बायीं तरफ से ही कांवड़ियों को भेजने तथा भंडारे, शिविर को सड़क से 20 फिट की दूरी पर बायीं ओर ही संचालन की अनुमति दी गई है।