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कानो देखी: योगी जी अब भार तुम्हारे कंधो पर

Fri, 29 Jun 2018 07:57 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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- फोटो : amar ujala
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मोदी जी, योगी जी साथ-साथ हैं। आगे उ.प्र. में योगी युग ही चलने वाला है। यह पिछले कुछ समय से योगी जी की कड़ी मेहनत का नतीजा है। योगी जी ने इसकी शुरुआत बनारस से कर दी थी। 

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बनारस में बाबा विश्वनाथ सर्किट विकसित करने के लिए तोड़-फोड़ चल रही थी। इस तोड़-फोड़ का शिकार प्राचीन गणेश मंदिर भी हो गए थे। इसके बाद से योगी जी ने कमान संभाल ली और तोड़-फोड़ रुक गई। अब तो राज्यपाल राम नाईक भी योगी जी के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहे हैं। इतना ही नहीं योगी जी इस बार इलाहाबाद के कुंभ मेला का आयोजन भी अंतरराष्ट्रीय स्तर का करना चाहते हैं। 

हजारों करोड़ रुपये के बजट का प्रावधान किया जा रहा है। कुंभ के लिए अत्याधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करके सुंदर अस्थाई नगर बसाया जाएगा। धर्म और आध्यात्म के अद्भुत संगम को बनाने के लिए उ.प्र. सरकार कोई कसर नहीं छोडऩा चाहती। साफ, सफाई और स्वच्छता पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। 
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एक लाख टॉयलेट तैयार कराने की भी योजना है। दिलचस्प यह है कि योगी जी कि इस सद्इच्छा को संघ और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तथा भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की वाहवाही भी मिलने लगी है। इतना ही नहीं दीपावली पर योगी जी अयोध्या में भव्य आयोजन की तैयारी करेंगे। बनारस की देव दीपावली को भी दो गुणा उत्साह से मनाया जाएगा। बताते हैं सब 2019 को ध्यान रखकर हो रहा है। बाकी तो योगी और मोदी जी ही जानें।

अजीत डोभाल जी मुस्कराए

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल देर-सबेर हर मुश्किल साध लेते हैं। डोभाल को वैसे भी प्रधानमंत्री जी का भरोसा हासिल है। उनके राष्ट्रप्रेम पर विरोधियों को भी कभी शक नहीं होता। वैसे भी इस समय वह फार्म में चल रहे हैं। चीन के साथ सब ठीक चल रहा है तो रूस भी भारत के रुख से ठीक-ठाक है। 

यूरोपीय देश पुराने मिजाज में चल रहे हैं। अमेरिका भी कुछ एक राय पर नहीं आ पा रहा है। बस एक ही दु:खती रग थी-कश्मीर। कश्मीर नीति को लेकर हो रही आलोचना पैर का पसीना सिर पर चढ़ा रही थी। 

कश्मीर इसलिए भी टेढ़ा हो रहा था कि एक तरफ पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई पेशानी पर बल ला रही थी तो दूसरी तरफ जम्मू-कश्मीर सरकार का ये मत करो, वो मत करो। 

डोभाल साहब जब भी राज्य सरकार पर चर्चा करते तो उन्हें शांत रहने की सलाह दे दी जाती थी। लेकिन कट्टरराष्ट्रवाद की सोच रखने वाले डोभाल जी अंतत: अपनी बात मनवाने में कामयाब हो गए। 

संघ पहले से महबूबा सरकार के रवैये से खफा था। बताते हैं जब से भाजपा ने महबूबा सरकार से समर्थन वापस लिया है, डोभाल साहब मुस्करा रहे हैं। अब जल्द ही जम्मू-कश्मीर को नया राज्यपाल मिल सकता है। हालांकि वोहरा जी का उत्तराधिकारी ढूंढना मुश्किल ही है, डोभाल साहब भी चाहते हैं कि वह कुछ महीने बने रहें लेकिन इसी के साथ विकल्प पर भी निगाह दौड़ा रहे हैं। पूर्व आईबी प्रमुख दिनेश्वर शर्मा भी वार्ताकार के तौर उन्ही की पसंद रहे। उन्हें उम्मीद भी है कि गाड़ी अगर थोड़ी पटरी पर आ गई तो मोदी सरकार के लिए 2019 भी आसानी से पार हो जाएगा। देखिए आगे क्या होता है?

जब उनको रेवड़ी मिली तो मुझे क्यों नहीं

पुराने अफसरों की आंखो में चमक है। यह चमक फिर से रोजगार पाने की है। सचिव और बड़े पदों से रिटायर हुए अफसर बाकायदा सचिवालयों के चक्कर काट रहे हैं। एक साहब विधि एवं न्याय मंत्रालय में मिल गए। इन्हें रिटायर होने के दो महीने बाद यूपीए सरकार ने दो साल के करार पर मंत्रालय का सचिव बनाया था।

सचिव पद का कार्यकाल खत्म होते ही मेंबर कैट लग गए। अब वहां का भी कार्यकाल खत्म हो चला है तो नए रोजगार की तलाश है। साहब को भरोसा मिल चुका है। अब उम्मीद में आ रहे हैं कि जल्द ही तैनाती की सूचना मिलने वाली है। बड़े शान से कहते भी हैं कि यह सरकार तो यूपीए से भी अच्छी है।

बड़े पैमाने पर रिटायर अफसरों को रोजगार दे रही है। सौकड़ा भर के करीब पुराने अफसर सरकार की कृपा पर मलाई काट रहे हैं। ऐसे में घर बैठकर क्या मिलेगा। नई नौकरी मिल जाएगी तो टाइम भी पास हो जाएगा। यह पूछने पर कि आप के हाथ कौन सा जादुई चिराग लगा, तो वह भी सुन लीजिए।

अब उनका भी रास्ता बनेगा

- फोटो : amar ujala
उ.प्र. सरकार के मंत्री ओम प्रकाश राजभर के बेटे की शादी का कार्यक्रम था और मंत्री जी फावड़ा हाथ में लेकर रास्ता बनवा रहे थे। काफी दु:खी थे। दु:ख का कारण भी था। मंत्री जी की लाख कोशिशों के बाद भी रास्ता बनवाने में सरकार ने कोई रुचि नहीं दिखाई। दिखाए भी तो कैसे? मंत्री जी मुख्यमंत्री जी को ही आईना दिखाते रहते हैं। 

मन में आता है तो केशव राग भी गा लेते हैं। उपमुख्यमंत्री केशव जी की वैसे भी तबियत ठीक नहीं चल रही है। जब मंत्री जी के फावड़ा हाथ में लिए तस्वीर योगी धाम पहुंची तो करीबी मुस्कराए।

सुना है, टीम योगी चाहती है कि मंत्री जी पर भी कोई निर्णय हो ही जाए। उनका भी रास्ता बने। लेकिन बताते हैं कि मामला वोट से भी जुड़ा है। इसलिए भाजपा हाई कमान अभी इस बारे में कुछ नहीं बोल रहा है। वहीं, टीम योगी है कि कहां चुप रहने वाली। उसे उम्मीद है कि देर से ही सही लेकिन रास्ता तो मंत्री जी का भी बनेगा। खैर, देखिए आगे क्या होता है।

टीम मोदी बदल रही है

देश बदले या न बदले, लेकिन चुनावी साल देखकर टीम मोदी बदल रही है। टीम कमांडर-इन-चीफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तर्ज पर बदल रही है। प्रधानमंत्री संघ की सुनने लगे हैं। 

संघ प्रमुख मोहन भागवत की सुनने लगे हैं। पिछले सप्ताह संघ के नेताओं के साथ मैराथन बैठक हुई। प्रधानमंत्री डिनर बैठक की और फिर अगले दिन भी भेंट मुलाकात हुई। फीड-बैक लिए गए। 

संघ ने कुछ मुद्दों पर चिंता जताई और इसके समाधान के लिए पहल किए जाने का उसे आश्वासन भी मिल गया। प्रधानमंत्री के स्तर से इस निर्देश को यकीनी बनाया जा रहा है कि संघ के साथ संवाद को और अधिक प्रगाढ़, सुचारु और व्यावहारिक बनाया जाए। उ.प्र. के मुख्यमंत्री योगी जी का सीधा संघ संवाद है। 

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह भी संघ को पूरा मान दे रहे हैं। जबकि अभी तक प्रधानमंत्री अपने हिसाब से चल रहे थे। जो उन्हें ठीक लग रहा था, उसी राह पर आगे बढ़ते थे। 

जानकार बताते हैं कि कई बार ऐसा हुआ जब सरकार ने संघ के नेताओं की सलाह को किनारे रख दिया। लेकिन बताते हैं, अब सब कुछ फिर से ठीक हो रहा है। संघ भी पूरी तरह से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा के पीछे खड़ा है। यह बदलाव प्रधानमंत्री के स्तर पर आए बदलाव के बाद हुआ है। अमित शाह भी बदल गए हैं। पूरे देश का दौरा करके प्रबुद्ध लोगों से न केवल मिल रहे हैं, बल्कि 2019 के लिए समर्थन भी मांग रहे हैं।

कांग्रेस का डर

- फोटो : amar ujala
उगता सूरज देखकर भी अंधेरा कभी-कभी डरा देता है। यही कांग्रेस के साथ हो रहा है। पिछले कुछ महीने से राहुल गांधी लगातार गेन कर रहे हैं। उनकी छवि में निखार हो रहा है। सोनिया गांधी टीम यूपीए तैयार करने में व्यस्त हैं। 

टीम राहुल एआईसीसी और पीसीसी में अपने पांव जमा रही है। देश-विदेश से भी राहुल को मिलने वाले निमंत्रण की संख्या बढ़ गई है, लेकिन इसके बावजूद कांग्रेस के आला नेता अज्ञात भय से डर रहे हैं। 

पार्टी के किसी भी पुराने दिग्गज नेता से पूछकर देखिए। वह एक खटराग अलापता है कि अंत में कुछ ऐसा हो जा रहा है जहां एक गड़बड़ी पार्टी का बंटाधार करा देती है। पार्टी का एक बड़ा धड़ा टीम अहमद पटेल की ही बधिया उधेडऩे में  जुटा है।

एक महासचिव तो साफ कहते हैं कि पार्टी को विरोधियों से उतना खतरा नहीं है, जितना हमारे मणिशंकर गले का हार बनकर दम घोंट दे रहे हैं। पार्टी एक पुराने और दिग्गज नेता का कहना है कि राहुल गांधी और सोनिया गांधी ने ऐसा कुछ नहीं किया है कि उन्हें शर्मिंदा होना पड़े, लेकिन पंचिंग बैग राबर्ट बाबा तो हैं। वह बेचारे कुछ भी न करें तो भी भाजपा जब मन में आएगी उनको बजाएगी। ताजा मामला देख लीजिए। वाड्रा की कंपनी ने तीन करोड़ रुपये जमा कराए लेकिन इसके बावजूद भाजपाइयों ने बैंड बजा दिया। ऊपर से मीडिया है कि हमारी सही खबरों को भी नहीं दिखाता।

नीतीश जी की हड़बड़ी

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की हड़बड़ाहट बढ़ रही है। वह भाजपा की तरफ से शुभ संदेश का इंतजार कर रहे हैं। वह प्रधानमंत्री से भी चर्चा कर आए हैं, लेकिन बताते हैं अभी तक उनके हाथ खाली हैं। क्योंकि प्रधानमंत्री जी ने राजनीतिक चर्चा का जिम्मा भाजपा अध्यक्ष अमित भाई शाह को सौंप रखा है। अमित शाह 11 जुलाई को पटना जाने वाले हैं।

शाह बिहार में भाजपा का दम आंक रहे हैं। खबर यह भी है कि उनकी टीम राम विलास पासवान और उपेन्द्र कुशवाहा को साथ रखने के अधिक पक्ष में है। इसमें पासवान के लिए छह सीट और कुशवाहा के लिए 3 सीट तक छोड़ी जा सकती है।

2014 में भाजपा ने बिहार में इन्हीं के सहारे 22 सीट जीत ली थी। ऐसे में जद(यू) प्रेम का लाभ उसे कम समझ में आ रहा है। जबकि नीतीश कुमार हैं कि सबकुछ साफ कर लेना चाह रहे हैं। वहीं भाजपा बिहार में केवल 25 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने के कदापि पक्ष में नहीं है।
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ठाड़े रहिए, अभी सोनिया-माया चर्चा बाकी है

बसपा सुप्रीमों ने म.प्र. में सभी सीटों पर विधानसभा चुनाव लडऩे का ऐलान कर दिया है। खबर है कि मायावती को सोनिया गांधी के संदेश वाहक कमलनाथ नहीं मना पाए। जबकि कमलनाथ इस कला में माहिर माने जाते हैं। इस खबर को सुनने के बाद सपा प्रमुख अखिलेश यादव को थोड़ी राहत मिली। 

भाजपा, खासकर म.प्र. के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को भी इससे फौरी राहत हुई। लेकिन अभी न तो कांग्रेसी निराश हैं और न ही बसपा प्रमुख नाउम्मीद। सूत्र बताते हैं कि इसकी सूत्रधार सोनिया गांधी हैं। सोनिया गांधी की टीम 2019 की टीम यूपीए पर काम कर रही है। बसपा 2019 को ध्यान में रखकर अन्य राज्यों में सीटें मांग रही है। 

कांग्रेस उ.प्र. में अपना हित मांग रही है। बताते हैं जुलाई महीने में इस समीकरण के सध जाने के पूरे आसार हैं। इसके लिए कांग्रेस पार्टी को सोनिया गांधी के अगले मूव पर पूरा भरोसा है। वहीं बसपा को भी उम्मीद है कि कांग्रेस पार्टी गलतफहमी से बाहर आएगी। इसी पर सपा और भाजपा भी टकटकी लगाए है। वैसे बसपा के पास उ.प्र. के लिए एक प्लान बी भी है। उसके नेता राज्य के तमाम छोटे-छोटे दलों पर भी काम कर रही है।
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