कांची कामकोटि मठ के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती का बुधवार को चेन्नई में निधन हो गया। 83 साल के शंकराचार्य लंबे वक्त से बीमार चल रहे थे। आज उन्हें महासमाधि दे दी गई। अंतिम प्रक्रिया के दौरान मंत्रोच्चार के साथ उनकी महासमाधि को स्थापित किया गया। उनके शरीर पर भभूत लगाया गया और उनके चरणों में पुष्पांजलि अर्पित की गई। उनकी आत्मा की शांति के लिए मंत्रोच्चार किया गया।
पार्थिव शरीर को दफनाने की पूरी क्रिया को वृंदावन प्रवेशम कहा जाता है। इसकी शुरुआत अभिषेकम (स्नान) के साथ शुरू हुई। अभिषेकम प्रक्रिया में दूध और शहद जैसी चीजों का इस्तेमाल किया जाता है। पूरे शरीर पर भभूत लगाकर संत, महंत, ऋषि और आचार्य मंत्रोच्चार करते हैं। अभिषेकम के बाद उनके पार्थिव शरीर को वृंदावन उपभवन ले जाया गया। जहां उनके पूर्ववर्ती चंद्रशेखर सरस्वती के अवशेष रखे गए थे।
जयेंद्र सरस्वती कामकोटि पीठ में हिंदुओं के 69 वें शंकराचार्य थे। खबरों के मुताबिक जनवरी माह में उन्हें अस्पताल में सांस लेने में तकलीफ की शिकायत के बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया था। पिछले साल शंकराचार्य नवंबर महीने में दिल्ली आए थे।
जयेंद्र सरस्वती 1954 में शंकराचार्य बने थे। इससे पहले 22 मार्च 1954 को चंद्रशेखेंद्ररा सरस्वती स्वामीगल ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था। उस वक्त वो सिर्फ 19 साल के थे।
उनका जन्म 18 जुलाई 1935 में तमिलनाडु में हुआ था। पीठ के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती का पद पर आसीन होने से पहले का नाम सुब्रमण्यम था।
शंकराचार्य के निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत तमाम दिग्गजों ने शोक प्रकट किया था। इसी कड़ी में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री ने भी शंकराचार्य के साथ बिताए पलों को याद किया। अपने ट्विटर हैंडल पर उन्होंने लिखा कि मुझे स्वामी जी की सेवा करने का मौका मिला, उनके तप से समाज सालों तक लाभान्वित रहेगा।