यमुना में गिरते पानी का ये शोर कानों को बेशक सुकून दे रहा हो लेकिन आंखों को तकलीफ ही देता है। ये किसी झरने की आवाज नहीं, बल्कि यमुना में गिरते शहर के नालों
की भयावह तस्वीर है। कान्हा के ब्रज में कालिंदी की दुर्दशा है। मथुरा से लेकर आगरा तक ऐसे सैकड़ों नाले कालिंदी के पानी को मैला कर रहे हैं। गंदगी ऐसी कि यमुना के
किनारे से गुजरने पर नाक पर रुमाल रखना पड़ता है।
मुगलों की राजधानी आगरा की पेयजल व्यवस्था यमुना नदी पर निर्भर है। मुगल काल से ही यमुना नदी से जलापूर्ति होती थी लेकिन अब हालात खराब होते जा रहे हैं।
यमुना नदी वर्ष में आठ महीने सूखी रहती है। मथुरा के गोकुल बैराज से प्रतिदिन 1200 क्यूसेक पानी का डिस्चार्ज होता है जो पर्याप्त नहीं है। ऊपर से नदी में गिरते नालों ने
यमुना को और प्रदूषित कर दिया है। बदहाली का आलम यह है कि यमुना के किनारे पर बदबू उठ रही है। जगह-जगह गंदगी पड़ी हुई है लेकिन इस तरफ किसी का ध्यान
नहीं है। यह केवल धर्म, अध्यात्म या आस्था का मामला ही नहीं है बल्कि आगरा शहरवासियों केजीवन से भी जुड़ा मुद्दा है।
दिनोदिन बढ़ती जा रही क्लोरीन की मात्रा
आगरा में जीवनी मंडी वाटर वर्क्स पर पेयजल के लिए यमुना का शोधन हो रहा है और दिनोंदिन क्लोरीन और एलम की मात्रा बढ़ती जा रही है। क्लोरीन और एलम का डोज
यहां 80 पीपीएम तक पहुंच जाती है, जोकि स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक है। सरकारी अमला सो रहा है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड केवल प्रदूषण की मात्रा और सुप्रीम कोर्ट के
आदेश का हवाला देकर प्रदूषण के आंकड़े इकट्टा कर लेता है। जल संस्थान मथुरा से पानी नहीं मिलने का हवाला देकर चुप्पी साध लेता है। जनप्रतिनिधि संकल्प लेकर चुप
बैठ जाते हैं। जनता पीने के शुद्ध पानी के लिए तड़प रही है लेकिन साहब से लेकर सेवकों तक के कान में रूई पड़ी हुई है।