ज्योति मल्होत्रा प्रकरण में लगातार नए-नए खुलासे हो रहे हैं। अब तक यह सामने आ चुका है कि देश की संवेदनशील जानकारी दुश्मन देश पाकिस्तान तक पहुंचाने में उसके अलावा उसके कई अन्य यूट्यूबर-सोशल मीडिया इन्फ्लूएंसर दोस्त भी शामिल हो सकते हैं। सरकार इन सब की कुंडली खंगाल रही है। जल्द ही इस मामले में कई अन्य बड़े यूट्यूब सेलेब्रिटी भी सामने आ सकते हैं, ऐसी संभावनाएं जताई जा रही हैं। इन परिस्थितियों में सबसे बड़ा प्रश्न यही पैदा हो रहा है कि करोड़ों यूट्यूबर और सोशल मीडिया उपभोक्ताओं के द्वारा प्रतिदिन बनाए जा रहे लाखों वीडियो पर सरकार निगरानी कैसे रखे? इसका तंत्र किस तरह विकसित किया जा सकता है?
कितने उपभोक्ता?
स्टैटिस्टा के एक आंकड़े के अनुसार फरवरी 2025 तक भारत में यूट्यूब के 491 मिलियन यानी 49.1 करोड़ सक्रिय उपभोक्ता थे। दूसरे नंबर पर अमेरिका (25.3 करोड़) और तीसरे नंबर पर ब्राजील (14.4 करोड़) हैं। इनमें से बड़ी संख्या यूट्यूब उपयोगकर्ता वीडियो-रील्स भी बनाते हैं। यूट्यूब के अलावा इंस्टाग्राम, ट्विटर, व्हाट्सएप जैसे कई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म हैं जिनके करोड़ों उपभोक्ता दिन-रात लाखों की संख्या में वीडियो-रील बना रहे हैं, संदेश प्रसारित कर रहे हैं और लोगों के बीच इनको पहुंचा रहे हैं। ऐसे में सरकार इतनी अधिक संख्या में उपभोक्ताओं पर बारीक नजर नहीं रख सकती। लेकिन यदि इन पर नजर न रखी गई तो इसका व्यापक नकारात्मक असर हो सकता है। पिछले कई उदाहरणों से यह समझा जा सकता है कि बेलगाम सोशल मीडिया देश-समाज के लिए बड़ा खतरा साबित हो सकती है।
कमाई का साधन बना यूट्यूब
यूट्यूब और इंस्टाग्राम अब केवल अपनी बात रखने का मंच ही नहीं रह गया है। इसके माध्यम से कई उपभोक्ता लाखों रूपये हर महीने कमा भी रहे हैं। टीवी चैनल खोलना या अखबार चलाना जितना महंगा सौदा है, उसे देखते हुए बड़े औद्योगिक घरानों के अलावा कोई मीडिया में अपनी दखलंदाजी करने की हिम्मत भी नहीं कर पाता था। लेकिन इन सोशल मीडिया मंचों ने आम और खास हर वर्ग के लोगों को बेहद सस्ता, सुलभ और व्यापक साधन उपलब्ध करा दिया है जिससे वे बिना लाग-लपेट अपनी बात पूरी दुनिया के सामने रख सकते हैं। भौतिक सीमाओं से पार होने के कारण इसके दर्शकों की संख्या असीमित हो सकती है। लेकिन जिस तरह कई सोशल मीडिया उपभोक्ताओं ने इन मंचों का दुरुपयोग किया है, थोड़ी सी प्रसिद्धि और पैसे के लिए अश्लीलता पड़ोसी है, उससे इस पर लगाम लगाने की जरूरत समझ आ रही है।
फर्जी अकाउंट सबसे बड़ी समस्या
ह्लाट्सअप के चार से पांच फीसदी तो इंस्टाग्राम के करीब 10 प्रतिशत उपभोक्ताओं को फर्जी बताया जाता है, लेकिन अनुमान है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर फर्जी नामों से बनाए-चलाए जा रहे अकाउंट्स की संख्या इससे बहुत अधिक हो सकती है। ज्यादातर गलत संदेश इन्हीं अकाउंट्स के जरिए फैलाए जाते हैं। जो अकाउंट वेरीफाइड तरीके से प्राप्त किए जा रहे हैं, उनके मालिकों तक पहुंचना और किसी गलत कंटेंट के लिए उन पर कार्रवाई करना फिर भी आसान है, लेकिन जो अकाउंट बिना किसी वैधानिक तरीके का उपयोग कर बनाए और चलाए जा रहे हैं, उन पर कार्रवाई करना सरकार के लिए सबसे बड़ा मुश्किल काम है।
AI के समय निगरानी रखना मुश्किल नहीं
तकनीकी मामलों के जानकार सुमित वैश्य ने अमर उजाला से कहा कि जो तकनीकी समस्या बनकर आई है, वही उसका समाधान भी पेश करती है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के जमाने में केवल एक अकाउंट से करोड़ों सोशल मीडिया इनफ्लुएंसर के कंटेंट का विश्लेषण किया जा सकता है। एआई तकनीक किसी वीडियो को देखकर उसके कंटेंट का विश्लेषण कर उसे संवेदनशील, अश्लील या अलग कैटेगरी में विभाजित कर उसकी सूचना सरकार को दे सकती है। केवल एक क्लिक के माध्यम से इन एकाउंट्स को ब्लॉक भी किया जा सकता है। ऐसे में अब इन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का गहन विश्लेषण कर उन पर कार्रवाई करना बहुत मुश्किल नहीं है। लेकिन इसके लिए केंद्र-राज्य सरकारों को एक तंत्र विकसित करने की आवश्यकता है।
अकाउंट बनाने के लिए आधार जैसी मानक सेवा का हो इस्तेमाल
सरकार के सामने सबसे बड़ी समस्या फर्जी एकाउंट हैं। लेकिन यदि सोशल मीडिया अकाउंट को बनाने में आधार कार्ड, लाइसेंस या मतदाता पहचान पत्र जैसे सरकारी दस्तावेजों का उपयोग करना अनिवार्य कर दिया जाए तो फर्जी अकाउंट की समस्या का समाधान खोजा जा सकता है। इससे किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का गलत उपयोग होने पर उपयोगकर्ता के विरुद्ध विधि अनुसार कार्रवाई की जा सकती है और उसको दंडित किया जा सकता है। इससे लोग अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर ज्यादा संवेदनशील होंगे और जिम्मेदारी से अपनी बात रखेंगे।
हालांकि, सबसे बेहतर हो कि उपभोक्ता संवेदनशील विषयों के प्रति जागरूक हों और कोई भी संवेदनशील जानकारी होने पर स्थानीय सुरक्षा तंत्र को इसकी सूचना दें तो ऐसे किसी भी आपराधिक गतिविधियों पर लगाम लगाई जा सकती है।