पुरानी यादों का जिक्र करते हुए वो आगे जोड़ते हैं, "कॉलेज में हमलोग खूब नाटक किया करते थे। वो न सिर्फ नाटकों में माहिर थे, टेबल टेनिस भी बेहतरीन खेलते थे।" उदय गावारे के अनुसार जस्टिस लोया इंटरनेशल कोर्ट ऑफ जस्टिस में हाल ही में चुने गए भारतीय जज दलवीर भंडारी के ओएसडी भी रहे थे।
जस्टिस लोया ने 1986 से 1994 तक लातूर कोर्ट में वकालत की। इस दौरान उन्होंने कई नामी वकीलों के अंदर काम किया। इसके बाद वो न्यायिक सेवा में चले गए। गावारे बताते हैं, "लॉ की पढाई पूरी करने के बाद हम 15 दोस्त वकालत में आए थे। जस्टिस लोया भी उनमें से एक थे। हमलोगों की सोच थी कि किसी के भी साथ अन्याय नहीं होने देंगे। जस्टिस लोया भी इसी तरह से सोचते थे।"
उन्होंने बताया कि वो किसी भी केस का संजीदगी से अध्ययन करते थे। वो कोर्ट में तथ्यों पर बात करते थे।
जस्टिस लोया सामान्य परिवार से थे। उनके परिवार में लोग व्यापार और किसानी करने थे। उनकी तीन बहनें और दो बेटे हैं। जस्टिस लोया जिस केस की सुनवाई कर रहे थे, उसमें भाजपा के वर्तमान अध्यक्ष और गुजरात के पूर्व गृहमंत्री अमित शाह अभियुक्त थे, जिन्हें लोया की मौत की बाद सीबीआई की विशेष अदालत के अगले जज ने बरी कर दिया था।
गावारे बताते हैं कि उनके दोस्त हंसमुख इंसान थे। वो तनाव बहुत कम लेते थे, लेकिन 2014 में जब वो दिवाली में लातूर घर आए थे तो बहुत तनाव में थे।
उदय गावारे कहते हैं, "वो उस समय सोहराबुद्दीन शेख एनकाउंटर मामले की सुनावाई कर रहे थे और वो उसे लेकर काफी तनाव में थे। वो बोलते थे कि मेरे पास बहुत सीरियस केस है। उन्होंने 'किसी' का फोन आने का भी जिक्र किया था। उन्होंने कहा था- मैं जो भी करूंगा कानून के दायरे में ही करूंगा।"
जस्टिस लोया जब भी बंबई से लातूर जाते थे अपने पुराने साथियों से जरूर मिलते थे। लेकिन 2014 में जब वो अंतिम बार वहां गए तो वे अपने दोस्तों और सहकर्मी से मिलने नहीं गए थे। एडवोकेट उदय गावारे अपने दोस्त के साथ बिताए पलों का फिर से जिक्र करते हैं। कहते हैं, "1983 से 1986 तक हमलोग कॉलेज में साथ थे। हमलोग हंसते थे, खेलते थे। एक-दूसरे का सुख-दुख शेयर करते थे।"
अपनी शादी के दिनों को याद करते हुए वह कहते हैं, "11 जून 1989 को मेरी शादी थी। वो दो दिन मेरे घर रहे थे। मुझे मेकअप कैसा करना है, कपड़े कैसे पहनने हैं, सब उन्होंने ही तय किया था। टाई तक बांधी थी।"
"वो सारे पल खत्म हो गए। ये सब सोचकर आंखों में आंसू आ जाते हैं।" जिस दिन उनकी मौत हुई थी, गावारे उनके घर गए थे। उन्होंने बताया कि जस्टिस लोया के पिता और अन्य परिजन उनकी मौत को प्राकृतिक मौत नहीं मान रहे थे। उनके मन में मौत को लेकर कई सवाल थे।