भारत के 50वें मुख्य न्यायाधीश बनने जा रहे धनंजय यशवंत चंद्रचूड़ कहते हैं कि अदालतों का काम कानूनी जवाबदेही के साथ अत्याचार दूर करना है। उनके फैसले जितने मजबूत और तार्किक होते हैं, उतनी ही बेबाकी के साथ वे असहमति भी जताते हैं। कई फैसलों में पूरी पीठ से अलग राय रखते हुए वे असहमति को लोकतंत्र का सेफ्टी वाल्व करार देते हैं।
निष्पक्षता और पारदर्शिता को न्यायिक प्रणाली के लिए अहम मानते हुए वे अपने पिता भूतपूर्व चीफ जस्टिस वाईवी चंद्रचूड़ के व्यभिचार व निजता पर दिए फैसलों को पलट चुके हैं। वहीं, हाल ही में अदालती कार्यवाही के बारे में जानने को नागरिकों का अधिकार बताते हुए अदालत की कार्यवाही का सीधा प्रसारण शुरू किया। व्यभिचार और समलैंगिक संबंधों को गैर-आपराधिक बनाने वाले फैसले देकर उन्होंने यौन व्यवहार को लेकर जारी सामाजिक व व्यवस्थागत रूढ़ीवाद को झकझोरा।
समलैंगिक संबंधों को अपराध बताने वाली भारतीय दंड संहिता की धारा-377 को उन्होंने मैकाले की विरासत बताते हुए कहा था कि अतीत के अन्याय को ठीक नहीं किया जा सकता, लेकिन भविष्य की दिशा तो तय की जा सकती है। वहीं, हदिया मामले में व्यभिचार को गैर-आपराधिक घोषित करते हुए यौन स्वेच्छाचारिता को शादी के तहत महिला की स्वायत्तता का विषय बताया था।
सबरीमाला मामले में फैसला देते हुए कहा था कि रिवाजों के संरक्षण और उनके इस्तेमाल ने संविधान की सर्वोच्चता छीन ली है। हाल ही में संविधान पीठ का हिस्सा रहते हुए उन्होंने पीठ से अलग राय रखते हुए भारत के मुख्य न्यायाधीश के कार्यालय को सार्वजनिक प्राधिकरण बताते हुए इसे सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत उत्तरदायी बताया था। उनकी इस राय के आधार पर ही अदालत में आरटीआई आवेदनों से निपटने के लिए एक ऑनलाइन मंच स्थापित करने की घोषणा की गई।
दिल्ली से एलएलबी हार्वर्ड से एलएलएम
11 नवंबर, 1959 को जन्मे जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की मां प्रभा चंद्रचूड़ शास्त्रीय संगीतकार थीं। उनकी स्कूली शिक्षा मुंबई और दिल्ली में हुई। उन्होंने दिल्ली के सेंट स्टीफन कॉलेज से ग्रेजुएशन किया। इसके बाद 1982 में दिल्ली यूनिवर्सिटी से एलएलबी की। यहां से वे अमेरिका की हार्वर्ड यूनिवर्सिटी पहुंचे, जहां पहले एलएलएम पूरी की और 1986 में जूरिडिकल साइंसेस में पीएचडी की उपाधि हासिल की।