भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश बीआर. गवई ने कहा है कि न्यायाधीशों को फैसले सुनाते समय और अदालत की कार्यवाही के दौरान विशेष संयम बरतना चाहिए। उन्होंने कहा कि कई बार अदालत में हल्के-फुल्के अंदाज में कही गई बातों को संदर्भ से हटाकर पेश किया जाता है, जिससे अनावश्यक विवाद खड़े हो जाते हैं।
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उन्होंने साफ कहा कि न्यायाधीशों को इस बात की चिंता नहीं करनी चाहिए कि उनके फैसले से कौन खुश है और कौन नाराज। उन्होंने कहा, 'न्यायाधीशों का काम है कि वे सामने रखे गए तथ्यों, कानून और संविधान के आधार पर फैसला करें। यह मेरे लिए कभी मायने नहीं रखता था कि लोग मुझे पसंद कर रहे हैं या विरोध कर रहे हैं।'
सोशल मीडिया बना चुनौती- गवई
पूर्व सीजेआई बीआर गवई ने सोशल मीडिया की भूमिका पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि आज के दौर में सोशल मीडिया एक तरह से मुसीबत बन गया है, क्योंकि न्यायाधीशों के कुछ शब्दों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया जाता है। उन्होंने कहा, 'सबसे अच्छा यही है कि कम बोला जाए। वैसे भी न्यायाधीशों को अपने फैसलों के ज़रिये बोलना चाहिए, शब्दों के ज़रिये नहीं।'
संविधान के निर्देशक सिद्धांतों पर जोर
संविधान के निर्देशक सिद्धांतों के महत्व पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि केशवानंद भारती मामले ने 'बेसिक स्ट्रक्चर डॉक्ट्रिन' यानी संविधान की मूल संरचना के सिद्धांत को स्थापित किया। उन्होंने बताया कि पहले यह माना जाता था कि मौलिक अधिकारों और निर्देशक सिद्धांतों में टकराव होने पर निर्देशक सिद्धांत पीछे हटेंगे, लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दोनों मिलकर ही संविधान की आत्मा और अंतरात्मा हैं।
'संसद या न्यायपालिका नहीं, संविधान सर्वोच्च'
राज्य के अंगों की सर्वोच्चता पर सवाल के जवाब में पूर्व सीजेआई ने कहा कि न संसद सर्वोच्च है और न ही न्यायपालिका। उन्होंने कहा, 'सर्वोच्च केवल भारत का संविधान है। विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका, तीनों संविधान द्वारा तय की गई सीमाओं के भीतर काम करती हैं।' उन्होंने यह भी कहा कि तीनों संस्थाओं के बीच कभी-कभी टकराव या कार्यक्षेत्र में ओवरलैप हो सकता है, लेकिन यह कहना गलत है कि पिछले 10 वर्षों में न्यायपालिका कमजोर हुई है।
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न्यायिक स्वतंत्रता पर स्पष्ट संदेश
अपने 22 साल से अधिक के न्यायिक अनुभव का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि उन्होंने कई फैसले दिए, कुछ सरकार के पक्ष में और कुछ नागरिकों के पक्ष में। उन्होंने कहा कि यह धारणा गलत है कि जो जज सरकार के खिलाफ फैसला देता है वही स्वतंत्र होता है। उन्होंने कहा, 'न्यायाधीश तथ्यों और कानून के आधार पर फैसला करते हैं, न कि किसी दबाव या धारणा के तहत।'