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जजों के पास न्यायिक व्यवस्था में बोलने की कितनी आजादी?

Mon, 15 May 2017 12:03 PM IST
amarujala.com- Written by: कृति पाराशर
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जस्टिस कर्णन
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कलकत्ता हाईकोर्ट के जज, जस्टिस कर्णन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें कोर्ट की अवमानना का दोषी पाकर 6 महीने की सजा सुनाई है। भारतीय न्याय प्रणाली में ऐसा पहली बार हुआ है कि शीर्ष अदालत ने एक हाईकोर्ट के जज के खिलाफ अवमानना की कड़ी कार्रवाई की है। 
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सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस कर्णन के न्यायिक दायित्वों पर फिलहाल प्रतिबंध लगा दिया है। भारतीय न्यायप्रणाली में हाईकोर्ट जज के तौर पर उनके खिलाफ कार्रवाई संसद के अधिकार क्षेत्र में है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट उनकी शक्तियों को वापस ले सकता है, उनके काम पर रोक लगाकर निरोधक आदेश जारी कर सकता है।

भारतीय न्यायिक प्रणाली में इस तरह की घटनाएं हुई हैं, जब इस तरह के मामले सामने आए हैं। एक घटना 1972 की है जब एक जिला जज बरादाकांता मिश्रा को निलंबित कर दिया गया था। उन्होंने गवर्नर को एक पत्र लिखा था, जिसमें हाईकोर्ट पर दुर्भावनापूर्ण तरीके से 'विपक्ष का इंजन' होने का आरोप लगाया गया था। बाद में 1973 में ओडिशा हाईकोर्ट की बेंच ने उन्हें दोषी पाया था।
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इसलिए हुई जस्टिस कर्णन पर कार्रवाई, जानिए कानूनी आधार

जिस आरोप को लेकर सीएस कर्णन पर अवमानना की कार्रवाई की गई है उसका आधार सीएस कर्णन द्वारा प्रधानमंत्री को जनवरी में लिखा गया एक पत्र है। 23 जनवरी को लिखे गए इस खत में कर्णन ने कई मौजूदा जजों और सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जजों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे।

उन्होंने अपने ट्रांसफर ऑडर्स पर भी स्टे लगाकर एग्जीक्यूटिव्स से 2010 में किए गए ट्रांसफर को लेकर भी सवाल पूछे थे। उनके खिलाफ निंदा का मामला सात साल पहले का भी है। उनके खिलाफ की गई अवमानना की कार्रवाई को संविधान का अनुच्छेद 129 (सुप्रीम कोर्ट एज कोर्ट ऑफ रिकॉर्ड कैन पनिश फॉर इट्स इन्टरप्ट) और कन्टेम्प्ट ऑफ कोर्ट एक्ट 1961 मजबूती आधार प्रदान करता है।

इसके मुताबिक जज और मजिस्ट्रेट  या अन्य कोई व्यक्ति जो न्याय व्यवस्था से संबंध रखता है वो अपने कोर्ट या किसी भी अन्य कोर्ट की अवमानना के लिए उत्तरदायी हो सकता है। एक अन्य केस प्रीतम लाल और स्टेट ऑफ एमपी के केस के फैसले में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों के अवमानना के मामले में दोषियों को सजा देने की अंतर्निहित शक्तियों का उल्लेख किया गया है। कहा गया है कि अनुच्छेद 129 और 215 के मुताबिक इस तरह की कार्रवाई किसी भी तरह के कानून का उल्लंघन नहीं करती।

सुप्रीम कोर्ट के पास असीमित शक्तियां!

- फोटो : google
इन सब कानूनी ताकतों के आधार पर न्याय व्यवस्था के के प्रति विश्वास बढ़ाने और न्याय प्रणाली के प्रति आदर और सम्मान बनाए रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट के पास असीमित शक्तियां हैं। न्यायिक अवमानना के इस ऐतिहासिक मामले में की गई कार्रवाई के बाद कई सवाल भी उठते हैं।

क्या अनुच्छेद 19 (1) A के तहत न्यायिक व्यवस्था और जजों के पास वाक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है?  पिछले साल इसी वक्त 23 जनवरी 2016 को अमेरिका के जज क्लेयर ग्लिहम ने भी कोर्ट रूम की कमी और, जजों की जान को खतरे और उन पर बढ़ते काम के दबाव का मामला उठाया था।

उन्होंने कहा था कि उनकी शिकायतों को व्हिसिलब्लोअर प्रोटेक्शन एक्ट के तहत सहायता मिलनी चाहिए। उन्होंने मिनिस्ट्री ऑफ जस्टिस पर केस किया जिसे बाद में ये कहते हुए रद्द कर दिया गया कि वो मिनिस्ट्री ऑफ जस्टिस की कर्मचारी नहीं हैं। इसी तरह यूके में गिलहाम और मिनिस्ट्री ऑफ जस्टिस के मामले में भी व्हिसिलब्लोअर एक्ट का सहारा देने से इंकार कर दिया गया।
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क्या करना चाहिए था कर्णन को?

इन सब मामलों के आधार पर कहा जा सकता है कि अन्य विभागो और कर्मियों से अलग न्यायिक प्रणाली में व्हिसिलब्लोअर कानून का सहारा नहीं लिया जा सकता है। ऐसे में सवाल उठता है कि ऐसा क्या आधार है? जिससे जज खुद के न्यायिक सिस्टम और सहयोगी जजों की शिकायत कर सकता है

भारत में भी व्हिसिलब्लोअर की स्थिति यूके और यूएस जैसी ही नजर आती है। यहां भी हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों और न्याय व्यवस्था को इससे दूर रखा गया है। वर्तमान व्यवस्था में किसी भी हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के जज के खिलाफ शिकायत चीफ जस्टिस को की जा सकती है।

जिसके बाद चीफ जिस्टिस उनके खिलाफ जांच बिठा सकता हैा  इसके अलावा जरूरत पड़ने पर एक जांच के लिए पैनल का गठन कर सकता है और दोषी पाए जाने पर निलंबन के लिए संसद को संज्ञान दे सकता है। ऐसे में अगर जजों के खिलाफ कोई शिकायत जस्टिस कर्णन करना चाहते थे तो उसे उन्हें चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया को करना चाहिए था, न कि प्रधानमंत्री को।
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