केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री और रसायन एवं उर्वरक मंत्री जेपी नड्डा ने अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाली चीजों की ऊंची कीमत और ज्यादा मुनाफे के मुद्दे पर फार्मास्यूटिकल्स विभाग को मेडिकल क्षेत्र और अस्पतालों के साथ बैठक करने का निर्देश दिया है। यह निर्देश फार्मास्यूटिकल्स विभाग के सचिव के साथ हुई एक अहम बैठक के बाद दिया गया। इस पूरे मामले की शुरुआत महाराष्ट्र के एफडीए आयुक्त तुकाराम मुंढे की ओर से अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाले कई सामान की खरीद कीमत और उनकी अधिकतम खुदरा कीमत यानी एमआरपी के बीच बड़े अंतर की ओर ध्यान दिलाने के बाद हुई।
अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाले कंज्यूमेबल्स की खरीद कीमत और एमआरपी में बड़ा अंतर सामने आया मामले को उदाहरण के जरिए समझिए...
अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाले कंज्यूमेबल्स की खरीद कीमत और एमआरपी में बड़ा अंतर सामने आया है। उदाहरण: करीब 11 रुपये में खरीदे गए एक आईवी सेट की एमआरपी करीब 325 रुपये बताई गई। अंतर: कुछ उत्पादों में 150 से 2800 प्रतिशत तक का अंतर पाया गया। इसी को लेकर नड्डा ने बैठक के लिए कहा है।
अस्पतालों की चीजों की कीमत में कितना बड़ा अंतर मिला?
महाराष्ट्र एफडीए आयुक्त तुकाराम मुंढे ने अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाले कंज्यूमेबल्स की कीमतों को लेकर गंभीर सवाल उठाए थे। उनके मुताबिक मुंबई महानगर क्षेत्र और दूसरे अस्पतालों में किए गए सर्वे में एमआरपी और अस्पतालों की ओर से सामान खरीदने की कीमत के बीच 150 प्रतिशत से लेकर 2800 प्रतिशत तक का अंतर मिला। इनमें आईवी सेट, नेबुलाइजर और अस्पतालों में रोजाना इस्तेमाल होने वाली दूसरी चीजें शामिल थीं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा था कि अगर कोई आईवी सेट अस्पताल को करीब 11 रुपये में मिल रहा है तो उसकी एमआरपी करीब 325 रुपये क्यों होनी चाहिए।
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2800 प्रतिशत के अंतर पर तुकाराम मुंढे ने क्या सवाल उठाया?
तुकाराम मुंढे ने कहा था कि इतनी बड़ी कीमत का अंतर समझ से परे है। उनका सवाल था कि जब कोई सामान करीब 11 रुपये में अस्पताल को बेचा जा रहा है तो उसकी एमआरपी करीब 325 रुपये क्यों तय की गई। उन्होंने कहा था कि खरीद कीमत और एमआरपी के बीच का लाभ मरीज तक नहीं पहुंच रहा है। यह पैसा अस्पताल, फार्मेसी उद्योग, निर्माता या डीलर में से किसी के पास जा सकता है। उन्होंने इसे पारदर्शिता और उचित व्यापार के नजरिए से सवाल वाला मुद्दा बताया था। हालांकि, उन्होंने किसी निश्चित प्रतिशत की सीमा तय करने की मांग नहीं की थी।
क्या अब कीमतों की समीक्षा के लिए मेडिकल क्षेत्र से बात होगी?
मुंढे के विभाग ने इस मामले को राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण यानी एनपीपीए के सामने भी उठाया था। विभाग की ओर से एमआरपी, वास्तविक खरीद कीमत और अलग-अलग उत्पादों में मिले अंतर की जानकारी के साथ प्रस्ताव भेजा गया था।
मुंढे ने कहा था कि इस मुद्दे को सिर्फ मरीज, अस्पताल, दवा उद्योग या नियामक के बीच विवाद के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। अब जेपी नड्डा ने फार्मास्यूटिकल्स विभाग को मेडिकल क्षेत्र और अस्पतालों के साथ बैठक और चर्चा करने का निर्देश दिया है। इससे कीमत तय करने की मौजूदा व्यवस्था पर आगे चर्चा का रास्ता खुला है।
क्या अस्पतालों के लिए कोई तय मुनाफा सीमा लागू होगी?
तुकाराम मुंढे ने स्पष्ट किया था कि उनकी ओर से कोई तय सीमा या एक समान कीमत लागू करने का प्रस्ताव नहीं है। उनका कहना था कि एमआरपी हर उत्पाद के हिसाब से तय होनी चाहिए, लेकिन उसमें रखा गया मार्जिन तर्कसंगत, खुला और पारदर्शी होना चाहिए।
उन्होंने कुछ उत्पादों को औषधि मूल्य नियंत्रण आदेश यानी डीपीसीओ के दायरे में लाने, व्यापारिक मार्जिन तय करने, अलग-अलग एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल और कीमतों की निगरानी व्यवस्था मजबूत करने जैसे उपायों का सुझाव दिया था। अंतिम फैसला संबंधित सक्षम प्राधिकरण की ओर से लिया जाना है।
अस्पतालों के खर्च और मरीजों के हित के बीच कैसे बनेगा संतुलन?
मुंढे ने यह भी कहा था कि अस्पतालों पर 24 घंटे नर्सिंग, सुविधाओं के रखरखाव और दूसरी जरूरी सेवाओं का खर्च होता है। इसलिए किसी भी बदलाव पर अस्पतालों और दवा उद्योग से चर्चा जरूरी होगी। उनका कहना था कि फैसला एकतरफा या मनमाने तरीके से नहीं होना चाहिए। साथ ही उन्होंने यह सवाल भी उठाया था कि अगर कोई उत्पाद अस्पताल को 11 रुपये में मिल रहा है और उसकी एमआरपी 325 रुपये है, तो दोनों कीमतों के बीच का अंतर आखिर कहां जा रहा है। उनका जोर इस बात पर था कि निर्माता, अस्पताल और उपभोक्ता सभी के हितों को ध्यान में रखते हुए व्यवस्था पारदर्शी होनी चाहिए।