इंदिरा गांधी-जयप्रकाश नारायण
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जानकार बताते हैं कि एक बार प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने जेपी को गृह मंत्री का पद ऑफर किया था, लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया। सन 1973 में देश महंगाई और भ्रष्टाचार का दंश झेल रहा था। तब जेपी ने 'संपूर्ण क्रांति' का नारा दिया। शुरुआत गुजरात से हुई। बिहार में बड़ा आंदोलन हुआ। जेपी के आंदोलन से भयभीत तत्कालीन मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर ने गोलियां तक चलवा दीं। तीन हफ्ते तक हिंसा जारी रही और अर्द्धसैनिक बलों को बिहार में मोर्चा संभालना पड़ा था।
कहा जाता है कि देश में जेपी का आंदोलन बढ़ रहा था और इंदिरा गांधी के मन में भय पैदा हो रहा था। जानकारों की मानें तो इंदिरा को लगता था कि विदेशी ताकतों की मदद से जेपी देश में आंदोलन चला रहे हैं, जो उनकी कुर्सी छीन सकता है।
आखिरकार 1975 में इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगा ही दिया। जेपी और छह सौ से भी ज्यादा सत्ता विरोधी नेताओं को बंदी बनाकर जेल में डाल दिया गया। जेल में जेपी की तबीयत ज्यादा खराब होने लगी, सात महीने बाद उनको रिहा कर दिया गया। जेल से बाहर आकर जेपी ने हार नहीं मानी और 1977 में जेपी की अगुआई में इंदिरा गांधी का किला ढह गया। वे चुनाव हार गईं। जानकार बताते हैं कि जेपी की वजह से ही इंदिरा गांधी रोने तक पर मजबूर हो गईं थीं।
शुरू में जेपी का आंदोलन छात्रों और युवाओं की कुछ मांगों तक ही सीमित था, तब राज्य सरकार उनकी मांगे मान लेती तो शायद जन आंदोलन नहीं होता। इधर सरकार अपनी जिद पर अड़ी थी। जेपी ने भी उम्र के आखिरी पड़ाव में जून 1974 को संपूर्ण क्रांति का आह्वान कर दिया।
जेपी ने कहा कि देश में जो समस्याएं हैं, मसलन, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, महंगाई, शिक्षा में गुणवत्ता की कमी ये सब व्यवस्था की ही देन हैं। इन समस्याओं से तभी उबरा जा सकता है जब पूरी व्यवस्था ही बदल दी जाए। ऐसे में संपूर्ण व्यवस्था परिवर्तन के लिए संपूर्ण क्रांति की जरूरत है।