दरअसल नेहरू अंतरराष्ट्रीय शक्तियों का खेल समझ रहे थे। उन्हें कम्युनिस्ट चीन, कम्युनिस्ट सोवियत रूस का लगाव, अमेरिका और ब्रिटेन की कूटनीतिक पेचीदगियां समझ में आ रही थी। तब चीन और भारत में अच्छे रिश्ते थे। पंडित नेहरू को इसका साफ आभास हो रहा था कि यह कोशिश संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सीट का प्रस्ताव रखकर भारत और चीन के बीच में दूरी पैदा करना है।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की सीट के लिए चीन का दावा अधिक मजबूत था और पंडित नेहरू इस खेल में शामिल होकर न तो क्षेत्रीय शत्रुता को दावत देने के पक्षधर थे और न ही भारत को विवादास्पद स्थिति में ले जाने के। इसलिए उन्होंने सावधानी से निर्णय लिए। इसके बारे में भारतीय संसद को भी जानकारी दी, क्यों भारत संयुक्त राष्ट्र में चीन की स्थायी सदस्यता का पक्षधर है।
असल का पेंच कुछ और था
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका, ब्रिटेन, रूस और अन्य विश्व में शांति, स्थायित्व की स्थापना के लिए संयुक्त राष्ट्र चार्टर की ड्रॉफ्टिंग कर रहे थे। अन्य की भूमिका इसमें बहुत सीमित थी। अमेरिका के राष्ट्रपति फ्रैंकलिन रूजवेल्ट की इच्छा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अमेरिका, ब्रिटेन, सोवियत संघ रूस और चीन को लेने की थी, लेकिन साम्राज्यवादी मानसिकता के ब्रिटेन के विंस्टन चर्चिल को यह रास नहीं आ रहा था कि एक गैर यूरोपियन देश को ब्रिटेन के बराबरी का स्थान मिले। ऐसे में रूजवेल्ट फ्रांस को स्थायी सदस्यता देने पर सहमत हो गए।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में चीन को स्थान न दिए जाने की स्थिति में सोवियत संघ रूस ने यूएन ड्राफ्टिंग का बहिष्कार कर दिया। जनवरी 1950 में सोवियत संघ रूस फिर इसमें लौट आया। इसलिए मामला पेंचीदा था। एक कारण अमेरिका और कोरिया के बीच में हुए युद्ध का भी है। इस युद्ध की स्थिति के पैदा होने से पहले पंडित नेहरू का कहना था कि अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रूमैन चीन से बात करें। टकराव को रोका जा सकता है, लेकिन अमेरिका ने चीन के महत्व को नकारते हुए उसे खारिज कर दिया।
जून 1950 में युद्ध शुरू होने के दौरान भी पंडित नेहरू ने यही सलाह दी, लेकिन राष्ट्रपति ट्रूमैन ने खारिज कर दिया। बाद में अमेरिका इस युद्ध को नहीं जीत सका। संघर्ष विराम हुआ। उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया दो देश बन गए। यदि पंडित नेहरू की सलाह मानी गई होती तो कूटनीति के जानकारों का मानना है कि न तो कोरिया बंटता और न ही अमेरिका, कोरिया के हजारों लोगों की युद्ध में जान जाती। बताते हैं यह सभी पृष्ठभूमि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता की कूटनीति में काफी अहम थी।