कश्मीर में हिंदुओं की लगातार हो रही 'टारगेट किलिंग' से केंद्र सरकार की 'कश्मीर नीति' पर सवाल खड़े हो गए हैं। केवल इसी वर्ष अब तक 19 लोगों की हत्या हो चुकी है। इससे नाराज कश्मीरी पंडितों ने घाटी से सामूहिक पलायन की धमकी दी है। पंडितों ने खीर भवानी मेले के बहिष्कार की बात भी कही है। यदि ऐसा होता है तो यह केंद्र की उन कोशिशों पर तगड़ा झटका लगेगा, जिसमें केंद्र ने अनुच्छेद 370 और 35A के विवादित प्रावधान हटाकर कश्मीर में शांति लाने का दावा किया था। केंद्र ने घाटी के हालात जल्द से जल्द सामान्य करने और जम्मू-कश्मीर में चुनाव कराने की बात भी कही थी। बड़ा प्रश्न है कि कश्मीर नीति पर केंद्र से कहां चूक हो रही है? या यह आतंकियों द्वारा केंद्र की उन कोशिशों को नाकाम बताने की कोशिश है जिसमें केंद्र लगातार सफल हो रहा था।
कश्मीर मामलों के जानकार का कहना है कि अनुच्छेद 370 और 35A की समाप्ति को जिस तरह प्रचारित किया गया, उससे घाटी के एक वर्ग में नाराजगी है। घाटी में इसे मुसलमानों को दबाने की कोशिश के रूप में देखा जाता रहा है। जम्मू-कश्मीर में सीटों के परिसीमन में भी जम्मू क्षेत्र को छह अतिरिक्त सीटें मिलने से उसे वरीयता मिलती दिख रही है, जबकि घाटी की सीटों में केवल एक की बढ़ोतरी की सिफारिश हुई है। इससे घाटी के मुस्लिम समुदाय के लोगों में यह संदेश गया है कि सरकार कश्मीर के मुसलमानों की स्थिति कमजोर करना चाहती है।
देश के अलग-अलग हिस्सों में सांप्रदायिक उन्माद की घटनाओं ने भी घाटी के लोगों का आक्रोश बढ़ाया है। कश्मीर फाइल्स जैसी फ़िल्म की रिलीज के बाद युवाओं को लगा है कि इन माध्यमों से केवल एक वर्ग का पक्ष पेश किया जा रहा है, जबकि घाटी के मुसलमानों को खलनायक की तरह पेश किया जा रहा है। सच्चाई यह थी कि नब्बे के दशक में हिंदुओं की तरह मुसलमान भी आतंकवाद से पीड़ित हुए थे, लेकिन उनका जिक्र नहीं किया गया। इससे उन्हें अपने साथ भेदभाव का अहसास होता है।
इस कार्यकर्ता के मुताबिक इस बार की स्थिति क़ई मामलों में नब्बे के दशक से ज्यादा खराब है। नब्बे के दशक में आतंकियों की पहचान स्पष्ट थी, उनके हथियार और उन्हें पहुंचाने का रास्ता जाना-पहचाना था। सुरक्षा बलों के लिए उन्हें पहचानना और उन पर कार्रवाई करना कहीं ज्यादा आसान था। लेकिन इस बार हालात ज्यादा चिंताजनक है। इस बार के हमलों में आतंकी ऐसे लड़कों का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिनका पहले कोई आपराधिक बैक ग्राउंड नहीं है। माना जा रहा है कि इस तरह के आतंकी अचानक हमला कर भीड़ में सामान्य लोगों के बीच घुलमिल जाते हैं। इसलिए हमले के पूर्व या बाद में इनकी पहचान करना मुश्किल हो गया है। यही कारण है कि इस बार हालात ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो गई है।
कश्मीर मामलों के जानकार रजनीश कुमार ने अमर उजाला को बताया कि कश्मीर में केंद्र की नीति बेहद सफल रही है। लगातार आतंकियों को मौत के घाट उतारा गया है, युवाओं को नौकरियों-व्यापार के अवसर उपलब्ध कराए गए हैं। पंचायत चुनाव अच्छी तरह होने के बाद अब राज्य स्तरीय चुनाव कराने की कोशिशें हो रही हैं। पाकिस्तानी हुक्मरानों और आतंकियों को लगता है कि यदि कश्मीर में विधानसभा चुनाव भी सफलतापूर्वक संपन्न हो जाते हैं तो इससे घाटी से उनका अस्तित्व समाप्त हो जायेगा।
उन्होंने कहा कि जिस कश्मीर में कुछ शरारती तत्वों द्वारा आपत्तिजनक झंडे लहराए जाते थे, उसी कश्मीर के लालचौक पर अब तिरंगा फहराया जाता है। कश्मीरी युवा मुसलमान तिरंगे के साथ आगे बढ़ रहे हैं। स्पष्ट है कि एक वर्ग को कश्मीर की यह बदलती तस्वीर अच्छी नहीं लग रही है। वह केंद्र की अनुच्छेद 370 और 35A को हटाने को गलत साबित करने के लिए इस तरह की घटनाओं को बढ़ावा दे रहा है।