अभी तक आपने सुरक्षा बलों को अमरनाथ यात्रा के मार्ग की सुरक्षा करते हुए देखा होगा, मगर इनके साथ ही सुरक्षा चक्र में शामिल एक अहम कड़ी और भी है। हो सकता है कि इसके बारे में बहुत कम लोग जानते हों। सीआरपीएफ के 42 खोजी कुत्ते, जिनका इशारा मिलने के बाद ही यह तय होता है कि अमरनाथ यात्रा आगे बढ़ेगी या नहीं।
रोजाना दो सौ किलोमीटर लंबे मार्ग की सुरक्षा करते हैं
ये कुत्ते करीब दो सौ किलोमीटर के रास्ते पर चलकर सुरक्षा बलों को रूट सुरक्षित होने की गारंटी देते हैं। ये न केवल जमीन में चार फुट नीचे तक दबी विस्फोटक सामग्री खोज निकालते हैं, बल्कि आसपास के इलाके में कोई भी संदिग्ध व्यक्ति अगर इनकी नजर में आ जाए तो बिना किसी देरी के वह सूचना सीआरपीएफ तक पहुँच जाती है।
4-5 किलोमीटर का रास्ता साफ करता है एक खोजी कुत्ता
सीआरपीएफ के मुताबिक, एक कुत्ता चार-पांच किलोमीटर का रास्ता तय कर यह बताता है कि आगे सब कुछ ठीक है या कोई खतरा है। खोजी कुत्ते की सूंघने की क्षमता इतनी ही होती है। चार किलोमीटर के बाद कुत्ते को विश्राम के लिए गाड़ी में बैठा दिया जाता है और दूसरा कुत्ता डयूटी संभाल लेता है।
अमरनाथ यात्रा के लिए जवाहर टनल से निकलने वाले दोनों रास्ते, पहलगाम और बालटाल के करीब दो सौ किलोमीटर लंबे रूट को सुरक्षा के लिहाज से क्लीयर करने की जिम्मेदारी इन्हीं खोजी कुत्तों पर है। पिछले दिनों पंपोर में हाईवे पर एक काले रंग का बैग रखा था, सबसे पहले इन्हीं खोजी कुत्तों ने उसे देखा और यह पक्का किया कि उसमें कोई विस्फोटक सामग्री तो नहीं है।
यात्री शिविरों के आसपास भी इनकी नजरें लगी रहती हैं
जहां जहां पर यात्री शिविर लगते हैं, वहां भी खोजी कुत्ते सुरक्षा में तैनात रहते हैं। 24 घंटे में छह-सात बार ये कुत्ते शिविर के चारों तरफ चक्कर लगाते हैं। कई बार दूसरे भवन या पहाड़ की उंचाई से ये शिविर की सुरक्षा व्यवस्था को पुख्ता करते हैं। महज एक मिनट में ये कुत्ते दो से तीन टैंटों की सुरक्षा जाँच लेते हैं। इस बीच इन्हें कोई हथियार नजर आ जाए तो ये अपने उस्ताद यानी डॉग हैंडलर को वह सूचना दे देते हैं। दिन में कम से कम एक बार इन्हें यात्रियों के जत्थों के बीच से भी गुजारा जाता है।व हां पर ये जांचते हैं कि कोई संदिग्ध व्यक्ति तो इन यात्रियों के बीच नहीं आ गया है।
जवान एक है और ड्यूटी कितनी हैं, जानिए
कहने के लिए सीआरपीएफ के जवान यात्रियों की सुरक्षा में तैनात रहते हैं, लेकिन वे सुरक्षा से परे भी कई काम करते हैं। आपातकालीन स्थिति में किसी यात्री को खून की जरूरत है तो ये जवान ही उसके काम आते हैं। कई बार बीमार या बुजुर्ग यात्री, जिनकी हिम्मत शिविर में पहुँचने से पहले ही जवाब दे जाती है, उन्हें ये जवान ही शिविर तक पहुंचाते हैं। किसी को स्ट्रेचर पर तो किसी को खुद पिट्ठु बनकर ले जाते हैं। हेलीकॉप्टर के साथ टाईअप कराना है तो भी ये जवान ही काम आते हैं।
अब जानिए, सीआरपीएफ का कॉल सेंटर यानी हेल्प सेंटर, जहाँ रोजाना 600 कॉल आती हैं
यात्रा के दौरान सीआरपीएफ एक हेल्प सेंटर खोलती है। यह 24 घंटे काम करता है। बहुत से यात्री इसे कॉल सेंटर भी कहते हैं। इसका काम केवल यात्रियों से जुड़ी जानकारी, जैसे कौन सा जत्था कहां पर है, कितनी देर में पहुंचेगा, रूट कैसा है और मौसम की सूचना आदि बताना होता है। हालांकि इसका इस्तेमाल कई तरह से होता है। अगर बीच राह में किसी की गाड़ी खराब हो गई है, देश-दुनिया के किसी भी हिस्से से कोई व्यक्ति अपने परिचितों की जानकारी लेना चाहता है तो वह भी इसी कॉल सेंटर की मदद लेता है। जैसे ही कोई खबर मीडिया में आती हे कि यात्रा किन्हीं कारणों से रुक गई है तो पूरा दिन कॉल सेंटर बजने लगता है। कई बार यात्री अपने समूह से दूर हो जाते हैं तो उन्हें मिलाने का काम भी ये जवान ही करते हैं। चूंकि यात्रा के रूट पर फोन काम नहीं करता है, ऐसे में यात्रियों की नजरें सीआरपीएफ पर ही टिकती हैं। नियमानुसार, यह उनकी ड्यूटी का हिस्सा नहीं होता, लेकिन मानवता के चलते कुछ यात्रियों की बात सेटेलाइट फोन से करा दी जाती है। जब यात्री पैसा देने की बात कहते हैं तो ये जवान बस मुस्कुरा देते हैं।
अमरनाथ यात्रा के दौरान किसी भी श्रद्धालु को कोई परेशानी न हो, इसका पूरा ध्यान रखा जा रहा है।हमारे जवान दिन-रात चौकसी में लगे रहते हैं और साथ ही साथ मानवता के चलते अन्य जो भी उनसे बन पड़ता है, वे करते हैं।डॉग विंग भी अपना काम बख़ूबी तरीक़े से कर रही है।
ज़ुल्फिकार हसन, आईजी कश्मीर, सीआरपीएफ
14 जुलाई तक 15 हजार यात्रियों की मदद
पहलगाम रूट पर
जगह मरीजों का इलाज
मीर बाजार 1148
नूनवान 1355
पहलगाम 325
चंदनवाड़ी 327
शेषनाग 113
पोशपतरी 1554
पंजतरनी 540
पवित्र गुफा 4498
काजीगुंड 2078
बालटाल रूट
जगह मरीजों का इलाज
पंथा चैक 933
शादीपोरा 10
म्ंनिगम 59
रंगामोर 50
बालटाल 2142