जम्मू-कश्मीर में कश्मीरी पंडितों की वापसी से लेकर उनकी सुरक्षा को सरकार मुख्य एजेंडे के तौर पर लेकर चल रही है। लेकिन घाटी में तैनात सुरक्षा बलों के अफसरों को और सुरक्षा विशेषज्ञों को भी सरकार की कश्मीरी पंडितों को सुरक्षा देने की नीति हजम नहीं हो रही है। श्रीनगर में एक वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारी ने बताया कि सरकार की यह नीति तो 'आ बैल मुझे मार' जैसी है। तकलीफ यह भी है कि हमारी यह पीड़ा सरकार से कहे तो कौन?
वरिष्ठ अफसर का कहना है कि पिछले कुछ महीनों से टारगेट किलिंग के खतरे और खुफिया आशंकाओं को ध्यान में रखकर कश्मीरी पंडितों की सुरक्षा पर ध्यान दिया जा रहा है। गांव और कस्बों में सुरक्षा बल के जवान गश्त और तैनाती पर हैं। सूत्र का कहना है कि यह कदम बिना व्यापक तैयारी के उठाया गया। इसके समानांतर एक सच्चाई यह भी है कि कश्मीरी पंडित सुरक्षा बलों के जवानों को अपने घर के पास उनकी तैनाती नहीं देखना चाहते। सीआरपीएफ के एक अन्य बड़े अफसर ने भी इसकी पुष्टि की। सूत्र का कहना है कि कश्मीरी पंडितों के घरों के आस-पास जवानों की तैनाती के बाद उनके आतंकियों तथा पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के टारगेट पर आने का खतरा रहेगा। पिछले काफी सालों से सुरक्षा बल के एक कमांडेंट स्तर के अफसर घाटी में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
सूत्र का कहना है कि जो कश्मीरी पंडित घाटी और जिलों में हैं, वह यहां की अवाम के साथ दशकों से रह रहे हैं। जब क्षेत्र में आतंकवाद अपने शीर्ष पर था, उस दौर को भी उन्होंने साथ रह कर गुजारा है। वह मुश्किल दौर को भी पार कर आए हैं। इसलिए समझ में नहीं आता कि आखिर उन्हें अचानक कौन सा नया खतरा है? हालांकि सूत्र का कहना है कि इस मामले में उन्हें राय देने का अधिकार नहीं है। उनके जिम्मे लोगों की सुरक्षा का दायित्व है और वह इसे संवेदनशीलता के साथ निभा रहे हैं।
सुरक्षा अधिकारियों और गांव वालों से बात होने पर कई जमीनी सच्चाई सामने आई। त्राल से श्रीनगर में आकर बसे एक कश्मीरी पंडित का कहना है कि गृहमंत्री अमित शाह अक्तबूर के पहले सप्ताह में राज्य के तीन दिवसीय दौरे पर आए थे। उनकी जनसभा में एतिहासिक भीड़ हुई थी। सूत्र का कहना है कि अगले साल तक राज्य में चुनाव हुए तो मतदान का प्रतिशत भी बढ़ेगा। लेकिन अच्छा हुआ कि उन्होंने (गृहमंत्री) कश्मीरी पंडितों से भेंट नहीं की। जबकि कुछ पंडितों का समूह गृहमंत्री से मिलने की आस लगाए बैठा था।