आगामी मानसून सत्र में विपक्ष जस्टिस शेखर यादव के मुद्दे को जोर-शोर से उठाएगा। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने इस बाबत अपनी रणनीति बताई है। उन्होंने कहा कि सरकार अकेले महाभियोग नहीं चला सकती। इसके लिए लोकसभा में 100 सांसद और राज्यसभा में 50 सांसदों की जरूरत होती है। हम (कांग्रेस) इस मामले पर प्रस्ताव का समर्थन कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि कांग्रेस सांसद लोकसभा में न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के खिलाफ लाए जाने वाले प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने वालों में शामिल होंगे।
पूर्व CJI खन्ना ने राष्ट्रपति और PM को पत्र भेजा.. मजबूर कर दिया
शुक्रवार को दिए एक इंटरव्यू में रमेश कहा, सरकार किसी जज को पद से नहीं हटा सकती। सिर्फ सांसद किसी जज को हटा सकते हैं। कांग्रेस महासचिव ने कहा, हम इसे लेकर चिंतित है। मामले की सही तरीके से जांच होनी चाहिए। पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव खन्ना ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को पत्र भेजकर हमें इस मामले में मजबूर कर दिया है। उन्होंने एक रिपोर्ट दी है, लेकिन कोई प्राथमिकी नहीं दर्ज की गई है। मामले में एक प्राथमिकी दर्ज की जानी चाहिए।
समिति गठन के लिए आएगा प्रस्ताव...
रमेश ने कहा, लोकसभा में 100 और राज्यसभा में 50 सांसद इस आशय का प्रस्ताव ला सकते हैं। हम लोकसभा में इस प्रस्ताव को लाने का समर्थन करने जा रहे हैं। 100 सांसदों के हस्ताक्षर से लाए गए प्रस्ताव के आधार पर लोकसभा अध्यक्ष को तीन सदस्यीय जांच कमेटी बनानी होती है। इस कमेटी के गठन के प्रस्ताव आएगा और कांग्रेस सांसद हस्ताक्षर करेंगे।
जस्टिस शेखर यादव के खिलाफ राज्यसभा में महाभियोग प्रस्ताव
सांप्रदायिक बयान देने के आरोप में इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस शेखर यादव के खिलाफ राज्यसभा में महाभियोग प्रस्ताव लाने के मामले का जिक्र करते हुए रमेश ने कहा, उन्होंने (जस्टिस यादव ने) अपनी शपथ का उल्लंघन किया और संविधान के सभी सिद्धांतों का उल्लंघन किया। अब सात महीने बीत चुके हैं, और हमें अब भी पता नहीं है कि उनके खिलाफ क्या कार्रवाई होगी। मैं राज्यसभा के सभापति से कई बार मिल चुका हूं। वह प्रस्ताव अब भी लंबित है। उन्होंने कहा, सभापति खुद इस पर अड़े हैं या उन्हें इसके लिए मजबूर किया गया है, मुझे नहीं पता। मैं सभापति का सम्मान करता हूं। मुझे उम्मीद थी कि वे इसे मंजूरी देंगे। कम से कम हम तो यही उम्मीद करते हैं कि न्यायमूर्ति यादव के व्यवहार की जांच के लिए एक समिति गठित की जाए।
महाभियोग के लिए जरूरी यह संख्या
बता दें कि संविधान के अनुसार उच्च न्यायापालिका के किसी न्यायाधीश को सेवा से तभी हटाया जा सकता है जब संसद के दोनों सदनों द्वारा प्रस्ताव को वर्तमान सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से मंजूरी दे दी जाए। इसके बाद राष्ट्रपति को इसे मंजूरी देनी होती है। राज्यसभा में ऐसा प्रस्ताव तभी लाया जा सकता है जब 50 सदस्यों के हस्ताक्षर हों। लोकसभा के लिए 100 सदस्यों के हस्ताक्षर की जरूरत होती है।
जस्टिस शेखर कुमार यादव का विवाद क्या है?
बीते वर्ष 8 दिसंबर को जस्टिस शेखर कुमार यादव विश्व हिंदू परिषद (विहिप) की कानूनी शाखा की ओर से आयोजित एक कार्यक्रम में पहुंचे थे। आरोप है कि न्यायमूर्ति शेखर ने इसी कार्यक्रम में बहुसंख्यक समुदाय के पक्ष में टिप्पणी की। इसमें उन्होंने जोर देकर कहा कि हिंदुस्तान बहुसंख्यकों की इच्छा के अनुसार काम करेगा और सुझाव दिया कि कानून बहुसंख्यकों के हितों के अनुरूप हो। न्यायाधीश ने मुस्लिम समुदाय के भीतर की प्रथाओं की भी आलोचना की, जिसमें बहुविवाह, हलाला और तीन तलाक का संदर्भ दिया गया और इनकी तुलना हिंदू परंपराओं से की गई। इन टिप्पणियों में कथित तौर पर अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया गया है।
बयान के बाद क्या-क्या हुआ?
न्यायमूर्ति शेखर कुमार का बयान मीडिया में आने के बाद इसकी देश के कई अधिवक्ता संगठनों ने आलोचना की। बढ़ते विवाद के बीच न्यायिक जवाबदेही और सुधार अभियान (सीजेएआर) ने भारत के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना को पत्र लिखा जिसमें न्यायमूर्ति शेखर के खिलाफ आंतरिक जांच की मांग की गई थी। सीजेएआर के संयोजक प्रशांत भूषण ने न्यायमूर्ति पर न्यायिक नैतिकता का उल्लंघन करने और निष्पक्षता और धर्मनिरपेक्षता के संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन करने का आरोप लगाया। कई अन्य अधिवक्ता संगठनों ने भी न्यायमूर्ति शेखर के खिलाफ आंतरिक जांच और अनुशासनिक कार्रवाई की मांग की।
उधर सर्वोच्च न्यायालय ने भी विहिप के एक समारोह में न्यायमूर्ति शेखर कुमार यादव के कथित विवादास्पद बयानों से जुड़ी समाचार रिपोर्टों पर संज्ञान लिया। इसके साथ ही उच्चतम न्यायालय ने इस मुद्दे पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय से विवरण मांगा था।
विपक्ष ने बीते वर्ष राज्यसभा में दिया था नोटिस
विपक्ष ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस शेखर कुमार यादव के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव को लेकर बीते वर्ष राज्यसभा में नोटिस दिया था। इसके लिए निर्दलीय सांसद कपिल सिब्बल ने एक याचिका तैयार की थी। महाभियोग की प्रक्रिया शुरू करने का अनुरोध करते हुए विपक्ष जो प्रस्ताव तैयार किया था, उसमें न्यायाधीश जांच अधिनियम की धारा 3 (1) (बी) का हवाला दिया गया है। संविधान के अनुच्छेद 124(4) व 124 (5) का भी हवाला देते हुए कहा गया है कि जस्टिस शेखर ने बतौर जज अपने अधिकारों का दुरुपयोग और अवहेलना की है। याचिका के साथ भाषण के वीडियो क्लिप और खबरों की कटिंग भी पेश की जाएगी।
किस आधार पर किसी जज को हटाया जा सकता है?
संविधान का अनुच्छेद 121 कहता है कि सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के आचरण पर संसद में चर्चा नहीं की जा सकती है। हालांकि, राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत किए जाने वाले उस प्रस्ताव पर चर्चा हो सकती है जिसमें किसी जज को हटाने की बात की गई हो।
सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय का कोई न्यायाधीश राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा दे सकता है। हालांकि, किसी जज को हटाने के लिए महाभियोग की प्रक्रिया का पालन करना होगा जिसका जिक्र संविधान के अनुच्छेद 124(4) में है। किसी भी जज को संसद के प्रत्येक सदन द्वारा निर्धारित तरीके से अभिभाषण के बाद पारित राष्ट्रपति के आदेश के अलावा उनके पद से नहीं हटाया जा सकता है। किसी न्यायाधीश को हटाने के लिए याचिका केवल 'सिद्ध कदाचार' या 'अक्षमता' के आधार पर ही राष्ट्रपति को प्रस्तुत की जा सकती है।
तो क्या होती है महाभियोग की प्रक्रिया?
सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट के जज के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू कराने के लिए राज्यसभा में कम से कम 50 सांसदों की ओर से सदन के पीठासीन अधिकारी के सामने नोटिस के रूप में अनुरोध प्रस्तुत किया जाता है। नोटिस स्वीकार करने के बाद जज पर लगाए गए आरोपों की जांच के संदर्भ में महाभियोग की प्रक्रिया शुरू करने के लिए तीन सदस्यी समिति गठित की जाती है।
सुप्रीम कोर्ट के जज के खिलाफ शिकायत के मामले में गठित समिति में सुप्रीम कोर्ट के दो मौजूदा न्यायाधीश और एक न्यायविद, जबकि हाईकोर्ट के जज के मामले में गठित कमेटी में सुप्रीम कोर्ट के एक मौजूदा न्यायाधीश और हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के साथ एक न्यायविद को शामिल किया जाता है।
महाभियोग प्रस्ताव को पारित कराने के लिए संबंधित सदन में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों की कम से कम दो तिहाई सदस्यों का प्रस्ताव के पक्ष में समर्थन जरूरी है। यदि दोनों सदनों का प्रस्ताव संविधान के तहत है, तो राष्ट्रपति न्यायाधीश को पद से हटाने का आदेश जारी करते हैं। उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के कदाचार या अक्षमता की जांच की प्रक्रिया का उल्लेख न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 में किया गया है।