कांग्रेस के वरिष्ठ सांसद जयराम रमेश ने चुनाव आयोग पर मतदाता पंजीकरण प्रक्रिया में बदलाव कर पहली बार मतदान करने वाले युवाओं के सामने कथित तौर पर परेशानी खड़ी करने का आरोप लगाया है। उन्होंने इस मामले में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से जवाबदेही की मांग की।
चुनाव आयोग की ओर से युवा मतदाताओं के लिए विशेष नामांकन शिविर आयोजित करने के फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए रमेश ने आरोप लगाया कि आयोग ने इससे पहले नए मतदाताओं के पंजीकरण को मुश्किल बनाने के लिए फॉर्म 6 में बदलाव किए थे। उन्होंने इस बदलाव को “पूरी तरह अवैध और असंवैधानिक” बताया।
मुख्य चुनाव आयुक्त पर जयराम रमेश ने लगाए क्या आरोप?
रमेश ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा, “कल देर रात घबराए हुए चुनाव आयोग ने अधिकारियों को युवा मतदाताओं के लिए विशेष नामांकन शिविर आयोजित करने और सोशल मीडिया के जरिए उनका ‘व्यापक प्रचार’ करने का निर्देश दिया। लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त ने इससे पहले फॉर्म 6 में ऐसा बदलाव किया था, जिससे युवा मतदाताओं को जोड़ना लगभग असंभव हो गया था।”
उन्होंने आरोप लगाया कि फॉर्म 6 में एक नया अनिवार्य हिस्सा जोड़ा गया, जिसमें आवेदक से यह जानकारी मांगी गई कि उसके माता-पिता या दादा-दादी पिछले विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) का हिस्सा थे या नहीं। रमेश के अनुसार, इससे पहली बार मतदान करने वाले जेन जी मतदाताओं के लिए पंजीकरण में बाधा पैदा हुई।
रमेश ने बदलाव को गिनाईं कौन सी तीन आपत्तियां?
- उल्लंघन 1: जुलाई 2026 की शुरुआत में ऑनलाइन फॉर्म को बिना किसी आधिकारिक अधिसूचना के चुपचाप बदल दिया गया।
- उल्लंघन 2: चुनाव आयोग के पास फॉर्म 6 में संशोधन करने का अधिकार नहीं है। जनप्रतिनिधित्व कानून, 1950 के तहत यह अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है। यह चुनाव आयोग की ओर से अधिकार क्षेत्र का बड़ा अतिक्रमण है।
- उल्लंघन 3: फॉर्म को पंजीकरण नियम, 1960 के तहत बनाए गए नियमों में किसी संशोधन के बिना बदला गया। ऐसा केवल केंद्र सरकार कर सकती है और इसके लिए संसद को उचित जानकारी देना जरूरी है।
रमेश ने आरोप लगाया कि कानून में तय वैधानिक फॉर्म को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के कहने पर एकतरफा तरीके से बदल दिया। उन्होंने कहा कि कानून लागू करने की जिम्मेदारी एक ऐसे व्यक्ति के हाथ में है, जिसके बारे में साबित हो चुका है कि उसने कानून तोड़ा है-भारतीय लोकतंत्र की हालत आखिर कहां तक गिर गई है? सुप्रीम कोर्ट को तत्काल स्वतः संज्ञान लेकर उन्हें जवाबदेह ठहराना चाहिए।
युवाओं की समस्याओं का जिक्र कर क्या बोली कांग्रेस?
उन्होंने द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट का हवाला देते हुए आगे दावा किया कि दो चुनाव आयुक्तों ने इस “अवैध और अनधिकृत” बदलाव को वापस लेने की मांग की थी, ताकि युवा और पहली बार मतदान करने वाले लोग बिना किसी परेशानी के पंजीकरण करा सकें।
रमेश ने कहा, “मुख्य चुनाव आयुक्त ने न केवल सांविधानिक परंपराओं और प्रक्रियाओं का उल्लंघन किया है, बल्कि संसद द्वारा बनाए गए कानून का भी जानबूझकर उल्लंघन किया है। उनका पद पर बने रहना भारत के लोगों का अपमान है।” उन्होंने कहा, “कानून लागू करने की जिम्मेदारी ऐसे व्यक्ति के हाथ में है, जिसे कानून तोड़ने वाला बताया जा रहा है। भारतीय लोकतंत्र की स्थिति आखिर कहां पहुंच गई है। सुप्रीम कोर्ट को तुरंत स्वतः संज्ञान लेना चाहिए और उन्हें जवाबदेह ठहराना चाहिए।”
इस्तीफा देकर स्थिति सुधार सकते हैं ज्ञानेश कुमार : जयराम रमेश
रमेश ने लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के बयान का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि ज्ञानेश कुमार इस्तीफा देकर खुद को इस मामले में गवाह बनाने के रास्ते से अपनी स्थिति सुधार सकते हैं।
कांग्रेस नेता के ये आरोप मतदाता सूची के एसआईआर को लेकर चल रहे राजनीतिक विवाद के बीच आए हैं। इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए रमेश ने कहा कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीनों के दौरान SIR प्रक्रिया से जुड़े फैसलों और आदेशों पर कम से कम 14 बार आपत्ति जताई थी।
कांग्रेस का देशभर में प्रदर्शन, विपक्षी दलों ने भी की आलोचना
कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, शिवसेना यूबीटी और वाम दलों समेत विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग की आलोचना तेज कर दी है। विपक्षी दल चुनावी पारदर्शिता को लेकर सवाल उठा रहे हैं और जवाबदेही की मांग कर रहे हैं। कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने जम्मू-कश्मीर, असम, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और मणिपुर समेत कई राज्यों में चुनाव आयोग के कामकाज और एसआईआर प्रक्रिया के खिलाफ प्रदर्शन किए।
असम में असम प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने गुवाहाटी के राजीव भवन से विरोध मार्च निकाला। पार्टी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने और उनके कार्यकाल के दौरान लिए गए फैसलों तथा मतदाता सूची में किए गए बदलावों की निष्पक्ष समीक्षा की मांग की। कांग्रेस ने कहा कि प्रदर्शन के दौरान असम कांग्रेस अध्यक्ष और कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई सहित कई नेताओं और कार्यकर्ताओं को पुलिस ने हिरासत में लिया।
इससे पहले शुक्रवार को जयराम रमेश ने मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रदर्शनों पर सरकार पर “क्रूर कार्रवाई” करने का आरोप लगाया था। उन्होंने कहा था कि कांग्रेस नेताओं, कार्यकर्ताओं, युवाओं, छात्रों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को देश के अलग-अलग हिस्सों में हिरासत में लिया गया।
रमेश ने एक्स पर लिखा था, “आज नागरिकों और कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने अपने संवैधानिक मताधिकार को कमजोर किए जाने और मुख्य चुनाव आयुक्त के कथित अनुचित कदमों के खिलाफ जवाबदेही की मांग को लेकर सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन किया।”
भाजपा ने आरोपों पर किया पलटवार
वहीं, भाजपा ने विपक्ष के आरोपों को खारिज किया है। भाजपा ने इन्हें चुनावी हार से ध्यान भटकाने की कोशिश बताया। केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने आरोपों पर सवाल उठाते हुए कहा कि अगर चुनाव आयोग पक्षपाती होता तो विपक्ष केरल जैसे राज्यों में चुनाव नहीं जीतता।
केंद्रीय मंत्री और एनडीए के प्रमुख सहयोगी चिराग पासवान ने कहा कि चुनाव आयोग को जनता के भरोसे को बनाए रखने के लिए आरोपों पर अपना पक्ष मजबूती से रखना चाहिए। पासवान ने कहा, “अगर चुनाव आयोग के खिलाफ इस तरह के सवाल उठाए जा रहे हैं, तो मेरा मानना है कि चुनाव आयोग और खासकर मुख्य चुनाव आयुक्त की भी जिम्मेदारी है कि वह मजबूती से अपना पक्ष रखें।”
आरोपों पर चुनाव आयोग ने दिया क्या जवाब?
इस बीच, चुनाव आयोग ने कहा है कि आंतरिक तकनीकी नोट और लिखित सवाल एक बहुसदस्यीय संस्था के सामान्य कामकाज का हिस्सा हैं। आयोग ने यह भी कहा कि एसआईआर से जुड़े सभी अंतिम फैसले कानूनी मंजूरी के साथ सर्वसम्मति से लिए गए।
चुनाव आयोग के अनुसार, एसआईआर सहित आयोग द्वारा लिए गए सभी अंतिम फैसलों को तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी प्राप्त थी और वे सर्वसम्मति से लिए गए थे। एसआईआर और चुनाव आयोग के आंतरिक कामकाज को लेकर चल रहा विवाद 29 सितंबर को नई दिल्ली में होने वाली कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में उठाए जाने की उम्मीद है।