अगस्त 2022 में धनखड़ उपराष्ट्रपति चुने गए थे। राज्यसभा के सभापति के रूप में उनका कार्यकाल उसी साल शीतकालीन सत्र के साथ शुरू हुआ। बतौर सभापति धनखड़ ने सुप्रीम कोर्ट के 2015 के उस फैसले को संसदीय संप्रभुता के खिलाफ और जनादेश की अवहेलना बताया, जिसमें एनजेसी अधिनियम को रद्द कर दिया था।
उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा देने के साथ ही जगदीप धनखड़ ने राज्यसभा की अपने हंगामेदार पारी का पटाक्षेप कर दिया। वकील से नेता बने धनखड़ सबसे पहले पश्चिम बंगाल के राज्यपाल रहते हुए राज्य सरकार के साथ लगातार टकराव के चलते सुर्खियों में आए थे। उपराष्ट्रपति पद पर आने के साथ ही उन्होंने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले की आलोचना कर दी।
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अगस्त 2022 में धनखड़ उपराष्ट्रपति चुने गए थे। राज्यसभा के सभापति के रूप में उनका कार्यकाल उसी साल शीतकालीन सत्र के साथ शुरू हुआ। बतौर सभापति धनखड़ ने सुप्रीम कोर्ट के 2015 के उस फैसले को संसदीय संप्रभुता के खिलाफ और जनादेश की अवहेलना बताया, जिसमें एनजेसी अधिनियम को रद्द कर दिया था। केंद्र सरकार ने उच्च न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए एनजेएसी अधिनियम बनाया था।
खरगे को लेकर बयान पर हुआ हंगामा
पिछले साल जून में सभापति तब विवाद में घिर गए, जब पेपर लीक मामले में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे के वेल में जाकर विरोध करने पर इसे संसद पर एक धब्बा कहा। इससे सदन में हंगामा हो गया था। बाद में राज्यसभा सदस्य कपिल सिब्बल ने धनखड़ के उच्च सदन के संचालन को लेकर सवाल उठाया था।
संघ पर बेबाक राय
धनखड़ ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को बेदाग साख वाला बताते हुए पिछले साल कहा था कि राष्ट्र के विकास में योगदान देने के सांविधानिक अधिकार हैं। उन्होंने आरएसएस को सर्वोच्च स्तर का वैश्विक थिंक टैंक भी बताया था।
एक प्रस्ताव पर एक ही सदस्य के दो बार हस्ताक्षर गंभीर मामला : धनखड़
जस्टिस यशवंत वर्मा के संबंध में प्रस्ताव पर राज्यसभा में जानकारी देते हुए सभापति जगदीप धनखड़ ने यह भी कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश को हटाने के लिए उनके सामने एक प्रस्ताव दिया गया था। उस पर 55 सदस्यों के हस्ताक्षर थे, लेकिन जब उन्होंने जांच की तो पाया कि असल में 54 सदस्य ही थे, लेकिन एक सदस्य के दो बार हस्ताक्षर किए गए। धनखड़ ने कहा कि उन्होंने जब उस सदस्य से इस बारे में पूछा तो उन्होंने दो बार हस्ताक्षर करने से इन्कार कर दिया। उन्होंने कहा कि एक प्रस्ताव पर किसी एक ही सदस्य के दो बार हस्ताक्षर हों और सदस्य यह कह कर इन्कार कर दे कि उन्होंने ऐसा नहीं किया है तो यह मामला गंभीर और दोषपूर्ण हो जाता है।