फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

Explainer: आज जगन्नाथ रथ यात्रा की शुरुआत, क्यों पुरी का आयोजन पूरी दुनिया के लिए खास; क्या है मान्यता-इतिहास?

स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Thu, 16 Jul 2026 07:28 AM IST

सार

ओडिशा के पुरी में होने वाली भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा का आयोजन अपने आप में एक बड़ी चुनौती होता है। दरअसल, लाखों भक्तों का प्रबंधन और इनके रुकने-रहने की व्यवस्था करना बेहद कठिन बन जाता है। इसके बावजूद हर वर्ष भक्त पूरे उल्लास के साथ यात्रा में जुटते हैं। आइये जानते हैं कि जगन्नाथ रथ यात्रा की मान्यता और कहानी क्या है, यह कब-कहां और कैसे शुरू हुई? क्यों ओडिशा का पुरी इस जगन्नाथ रथ यात्रा का केंद्र बनता चला गया? इस बार रथ यात्रा और इसमें सुरक्षा के लिए क्या इंतजाम हैं?
विज्ञापन
विज्ञापन
जगन्नाथ रथ यात्रा। - फोटो : अमर उजाला
ओडिशा के पुरी में आज (16 जुलाई, गुरुवार) से भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा की शुरुआत हो रही है। दुनियाभर में लोकप्रिय इस यात्रा को देखने के लिए देश-विदेश से सैलानी पहुंच रहे हैं। हिंदू धर्म में भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा को बहुत ही विशेष और पवित्र माना जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार हर वर्ष आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष द्वितीया तिथि को पुरी में भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा संग अपने-अपने रथों पर सवार होकर नगर का भ्रमण करते हुए गुंडीचा मंदिर की ओर प्रस्थान करते हैं। इस रथ यात्रा को देखने और रथ को अपने हाथों से खींचने का सौभाग्य प्राप्त करने के लिए हर साल लाखों लोग पुरी पहुंचते हैं। 



इस रथ यात्रा का आयोजन भी अपने आप में एक बड़ी चुनौती होता है। दरअसल, लाखों भक्तों का प्रबंधन और इनके रुकने-रहने की व्यवस्था करना बेहद कठिन बन जाता है। हालांकि, इसके बावजूद हर वर्ष भक्त पूरे उल्लास के साथ यात्रा में जुटते हैं। आइये जानते हैं कि जगन्नाथ रथ यात्रा की मान्यता और कहानी क्या है, यह कब-कहां और कैसे शुरू हुई? क्यों ओडिशा का पुरी इस जगन्नाथ रथ यात्रा का केंद्र बनता चला गया? 
विज्ञापन

जगन्नाथ रथ यात्रा। - फोटो : अमर उजाला
ओडिशा के पुरी में आज (16 जुलाई, गुरुवार) से भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा की शुरुआत हो रही है। दुनियाभर में लोकप्रिय इस यात्रा को देखने के लिए देश-विदेश से सैलानी पहुंच रहे हैं। हिंदू धर्म में भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा को बहुत ही विशेष और पवित्र माना जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार हर वर्ष आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष द्वितीया तिथि को पुरी में भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा संग अपने-अपने रथों पर सवार होकर नगर का भ्रमण करते हुए गुंडीचा मंदिर की ओर प्रस्थान करते हैं। इस रथ यात्रा को देखने और रथ को अपने हाथों से खींचने का सौभाग्य प्राप्त करने के लिए हर साल लाखों लोग पुरी पहुंचते हैं। 



इस रथ यात्रा का आयोजन भी अपने आप में एक बड़ी चुनौती होता है। दरअसल, लाखों भक्तों का प्रबंधन और इनके रुकने-रहने की व्यवस्था करना बेहद कठिन बन जाता है। हालांकि, इसके बावजूद हर वर्ष भक्त पूरे उल्लास के साथ यात्रा में जुटते हैं। आइये जानते हैं कि जगन्नाथ रथ यात्रा की मान्यता और कहानी क्या है, यह कब-कहां और कैसे शुरू हुई? क्यों ओडिशा का पुरी इस जगन्नाथ रथ यात्रा का केंद्र बनता चला गया? 

क्या है जगन्नाथ रथ यात्रा से जुड़ी मान्यताएं?

जगन्नाथ रथ यात्रा से जुड़ी कई गहरी धार्मिक और पौराणिक मान्यताएं हैं...

1. मौसी के घर या जन्मस्थान की यात्रा
  • पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई भगवान बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा के साथ नौ-दिवसीय वार्षिक यात्रा पर अपनी मौसी के घर- गुंडिचा मंदिर जाते हैं। 
  • कुछ धार्मिक ग्रंथों में गुंडिचा मंदिर को देवताओं का जन्मस्थान भी माना गया है। एक अन्य कथा यह भी कहती है कि तीनों भाई-बहन राजा इंद्रद्युम्न की रानी गुंडिचा से मिलने जाते हैं, जिनके बारे में माना जाता है कि उन्होंने ही मंदिर की स्थापना की थी। भगवान वहां सात दिनों तक रुक कर अपनी मौसी के हाथों बने स्वादिष्ट व्यंजनों का आनंद लेते हैं।
ये भी पढ़ें: Jagannath Rath Yatra 2026: क्यों निकाली जाती है भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा और क्या है मौसी के घर जाने की कथा ?

2. सभी भक्तों से बिना भेदभाव के मिलन
जगन्नाथ मंदिर में गैर-हिंदुओं का प्रवेश वर्जित है, इसलिए रथ यात्रा का सबसे बड़ा महत्व यह है कि इस दौरान ब्रह्मांड के नाथ स्वयं गर्भगृह से बाहर आकर अपने सभी भक्तों को दर्शन देते हैं। यह यात्रा दर्शाती है कि भगवान जाति, समुदाय या सामाजिक पृष्ठभूमि के किसी भी भेदभाव के बिना सभी के लिए सुलभ हैं। 

जगन्नाथ रथ यात्रा। - फोटो : अमर उजाला
3. पापों से मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति
यह माना जाता है कि सजे हुए रथों पर देवताओं के दर्शन मात्र से ही लोगों के सारे पाप धुल जाते हैं और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। पुरी मंदिर से जुड़े धार्मिक ग्रंथ 'वामदेव संहिता' के अनुसार, जो भी तीर्थयात्री गुंडिचा मंदिर में एक सप्ताह तक देवताओं के दर्शन करता है, उसे अपने पूर्वजों के साथ अनंत काल के लिए बैकुंठ (स्वर्ग) में स्थान प्राप्त होता है।

4. रथ और रस्सियों को खींचने का महत्व
रथ को संधिनी शक्ति का प्रतीक माना जाता है और ऐसी मान्यता है कि रथ को केवल छू लेने से ही भक्तों को भगवान जगन्नाथ की असीम कृपा प्राप्त होती है। रथ की रस्सियों को खींचना एक बेहद पवित्र और महान भक्ति का कार्य माना जाता है, जिससे भक्तों को दैवीय आशीर्वाद मिलता है और उनके जीवन में एक नए अध्याय की शुरुआत होती है।

5. भगवान का बीमार पड़ना (अणसर)
यात्रा शुरू होने से पहले, स्नान पूर्णिमा के अवसर पर देवताओं को 108 घड़ों के पवित्र जल से स्नान कराया जाता है। मान्यता है कि इसके बाद देवता बीमार पड़ जाते हैं और लगभग 14-15 दिनों तक एकांतवास (अणसर) या 'अणसर घर' में विश्राम करते हैं और इस दौरान भक्तों को उनके दर्शन नहीं होते। जब वे पूरी तरह से स्वस्थ हो जाते हैं (नव यौवन दर्शन), तब वे रथ यात्रा के लिए बाहर आते हैं। 

6. देवी लक्ष्मी का रूठना और रसगुल्ले का भोग 
एक रोचक मान्यता यह भी है कि रथ यात्रा में भगवान जगन्नाथ अपनी पत्नी देवी लक्ष्मी को साथ नहीं ले जाते। मान्यता के अनुसार, यात्रा के चौथे दिन देवी लक्ष्मी अपने पति को ढूंढते हुए गुंडिचा मंदिर आती हैं। जब भगवान नौ दिन बाद बहुदा यात्रा (वापसी की यात्रा) करके मंदिर लौटते हैं (नीलाद्रि बिजे), तो देवी लक्ष्मी उन पर क्रोधित होती हैं। उनका क्रोध शांत करने के लिए भगवान जगन्नाथ उन्हें रसगुल्ला भेंट करते हैं।

ये भी पढ़ें: Jagannath Rath Yatra 2026: जगन्नाथ रथ यात्रा से जुड़ी रोचक और महत्वपूर्ण तथ्य, जिन्हें हर भक्त को जानना चाहिए

7. भगवान कृष्ण की वृंदावन यात्रा
कुछ परंपराओं और मान्यताओं में इस यात्रा को भगवान कृष्ण के अपने भक्तों से मिलने के लिए वृंदावन जाने के प्रसंग से भी जोड़ा जाता है। इस यात्रा में शामिल होने वाले भक्त भगवान के प्रति अपना समर्पण और सकारात्मकता दर्शाने के लिए पीले और लाल रंग के कपड़े पहनना शुभ मानते हैं, जहां पीला रंग ज्ञान और शांति का प्रतीक है, वहीं लाल रंग शक्ति और सौभाग्य को दर्शाता है।
    

क्या है जगन्नाथ यात्रा का इतिहास?

जगन्नाथ रथ यात्रा का इतिहास प्राचीन हिंदू धर्मग्रंथों, ऐतिहासिक राजवंशों और सदियों पुरानी परंपराओं से जुड़ा है।

प्राचीन ग्रंथों में जिक्र: जगन्नाथ रथ यात्रा की उत्पत्ति की जड़ें प्राचीन हिंदू धर्मग्रंथों में गहराई तक फैली हुई हैं। स्कंद पुराण, ब्रह्म पुराण और पद्म पुराण जैसे ग्रंथों में भगवान जगन्नाथ की इस वार्षिक यात्रा और इसके धार्मिक महत्व का विस्तृत वर्णन मिलता है। इसके अलावा पुरी मंदिर से जुड़े धार्मिक ग्रंथ बामदेव संहिता में भी इस भव्य यात्रा का जिक्र किया गया है।

जगन्नाथ रथ यात्रा। - फोटो : अमर उजाला
12वीं शताब्दी में मंदिर का निर्माण: ऐतिहासिक रूप से, पुरी के प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी में पूर्वी गंगा राजवंश के राजा अनंतवर्मन चोडगंगा देव ने करवाया था। माना जाता है कि तब से यह भव्य रथ यात्रा एक सतत परंपरा के रूप में मनाई जा रही है और भारत के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में से एक बन गई है।

मुगल आक्रमणों के कारण रुकावटें: हालांकि, यह यात्रा सदियों से मनाई जा रही है, लेकिन ऐतिहासिक रूप से इसमें कुछ बाधाएं भी आईं। जगन्नाथ संस्कृति के शोधकर्ताओं के अनुसार, मुगल आक्रमणों के कारण वर्ष 1558 और 1735 के बीच 32 बार इस रथ यात्रा का आयोजन नहीं किया जा सका था।

अहमदाबाद रथ यात्रा का इतिहास: पुरी के अलावा भारत के अन्य हिस्सों में भी रथ यात्रा का अपना इतिहास है। लगभग 400 साल पहले गुजरात के अहमदाबाद में साबरमती नदी के तट पर तपस्वी सारंगदासजी ने जगन्नाथ मंदिर की स्थापना की थी। बाद में साल 1878 में महंत नृसिंहदासजी ने पुरी की ही तर्ज पर अहमदाबाद में भी रथ यात्रा की परंपरा शुरू की, जो आज तक जारी है। 
 

भगवान के रथ यात्रा की परंपरा क्या है, कहां से कहां तक होती यात्रा?

रथों की यात्रा का मार्ग (कहां से कहां तक)

यह भव्य यात्रा पुरी के 12वीं सदी के मुख्य जगन्नाथ मंदिर से शुरू होकर गुंडिचा मंदिर तक जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गुंडिचा मंदिर को भगवान की मौसी का घर या उनका जन्मस्थान माना जाता है। यह पूरा रास्ता बड़ा दांडा कहलाता है और दोनों मंदिरों के बीच की दूरी लगभग तीन किलोमीटर है। भगवान यहां कुछ दिन रुकने के बाद वापस लौटते हैं, जिसे बहुदा यात्रा कहा जाता है।

तीन अलग-अलग रथों की विशिष्ट परंपरा

यात्रा में भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के लिए तीन विशाल और अलग-अलग रथ होते हैं।

नंदीघोष: यह भगवान जगन्नाथ का रथ है, जो सबसे बड़ा होता है। इसमें 16 पहिए होते हैं और इसे इसके लाल और पीले रंग से पहचाना जा सकता है।

तालध्वज: यह भगवान बलभद्र का रथ है।

दर्पदलन या पद्मध्वज: यह देवी सुभद्रा का रथ है।

जगन्नाथ रथ यात्रा। - फोटो : अमर उजाला

रथ निर्माण की सदियों पुरानी परंपरा

  • इन रथों को हर साल बिल्कुल शुरुआत से नया बनाया जाता है। रथ निर्माण की प्रक्रिया यात्रा से लगभग दो-तीन महीने पहले अक्षय तृतीया से शुरू होती है और इसके लिए स्थानीय पेड़ों जैसे फासी, धौरा, सिमिली और असान की लकड़ियों का उपयोग किया जाता है।
  • लगभग 200 बढ़ई, चित्रकार और कारीगर हर दिन 12 घंटे काम करके इन्हें बनाते हैं। ये कारीगर पीढ़ियों से इसे वंशानुगत सेवा मानकर करते आ रहे हैं और किसी भी आधुनिक मशीन का उपयोग किए बिना अपने पूर्वजों से सीखी गई तकनीक का ही इस्तेमाल करते हैं।
  • हर रथ की ऊंचाई 40 फीट से ऊंची होती है, रंग, लकड़ी के घोड़े, रक्षक देवता और सारथी अलग-अलग होते हैं। सबसे ऊंचा और बड़ा रथ भगवान जगन्नाथ का होता है। इसके बाद भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा का रथ आता है।

जगन्नाथ रथ यात्रा। - फोटो : अमर उजाला

रथ खींचने और यात्रा के बाद की परंपरा

  • श्रद्धालु इन रथों को खींचने के लिए नारियल के रेशों से बनी 250 फीट लंबी रस्सियों का इस्तेमाल करते हैं। 
  • यात्रा समाप्त होने के बाद, इन रथों के कुछ हिस्सों (जैसे पहिए और धुरी) को मंदिर प्रशासन द्वारा बेच दिया जाता है।
  • जो लकड़ी बच जाती है उसका इस्तेमाल मंदिर की रसोई में ईंधन के रूप में किया जाता है।
परंपरा और आस्था का यह ऐतिहासिक पर्व आज भी अपने मूल स्वरूप और भव्यता के साथ मनाया जाता है, जिसमें पुरी में लाखों की संख्या में श्रद्धालु जुटते हैं।


इस बार जगन्नाथ यात्रा के लिए क्या तैयारी?

16 जुलाई 2026 से शुरू होने वाली जगन्नाथ रथ यात्रा के लिए इस बार ओडिशा सरकार और प्रशासन ने बहुत व्यापक और अभूतपूर्व तैयारियां की हैं, क्योंकि इस साल देश-विदेश से लगभग 30 लाख श्रद्धालुओं के पुरी पहुंचने की उम्मीद है। पिछले साल रथ यात्रा के दौरान हुई अव्यवस्थाओं, खासकर गुंडिचा मंदिर के बाहर से सबक लेते हुए, मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने सभी विभागों को आपसी समन्वय के साथ एक सुरक्षित, बिना गलती के और घटना-मुक्त रथ यात्रा सुनिश्चित करने के कड़े निर्देश दिए हैं।

जगन्नाथ रथ यात्रा। - फोटो : अमर उजाला
1. कड़ी सुरक्षा व्यवस्था
सुरक्षा और भीड़ प्रबंधन के लिए लगभग 12,000 पुलिसकर्मी, 19 वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी और 100 से अधिक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी तैनात किए गए हैं। इसके अलावा, केंद्रीय बलों के साथ-साथ भारतीय नौसेना और तटरक्षक बल को भी तटीय रास्तों पर निगरानी और श्रद्धालुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए लगाया गया है। पूरे क्षेत्र की निगरानी के लिए लगभग 500 सीसीटीवी कैमरे इंस्टॉल किए गए हैं।

2. स्वास्थ्य और आपातकालीन सुविधाएं 
किसी भी आपात स्थिति में श्रद्धालुओं को तेजी से और सुरक्षित बाहर निकालने के लिए कई निकासी गलियारे बनाए गए हैं। साथ ही, चिकित्सा सहायता के लिए पर्याप्त कर्मचारियों के साथ आठ अस्थायी अस्पताल स्थापित किए गए हैं।

3. जनसुविधाएं और स्वच्छता
महिलाओं, बुजुर्गों और विकलांग व्यक्तियों के लिए विशेष इंतजाम किए गए हैं। साफ-सफाई बनाए रखने के लिए 1,700 बायो-टॉयलेट स्थापित किए गए हैं, जिनकी देखरेख के लिए स्वयंसेवकों को तैनात किया गया है।

4. यातायात और परिवहन
यातायात को सुचारू बनाए रखने के लिए शहर में 595 स्थायी और 1,050 अस्थायी साइनेज बोर्ड लगाए गए हैं। इसके अतिरिक्त, श्रद्धालुओं के आवागमन को आसान बनाने के लिए भारतीय रेलवे ने 300 विशेष ट्रेनें चलाने की घोषणा की है।

5. बेहतर संचार प्रणाली
लोगों तक रियल-टाइम जानकारी पहुंचाने के लिए 65 बड़ी एलईडी स्क्रीन लगाई गई हैं और सूचनाओं के प्रसार के लिए 'बल्क मैसेजिंग' का सहारा लिया जा रहा है। मोबाइल नेटवर्क कनेक्टिविटी को मजबूत करने के लिए 16 स्थायी और कई अस्थायी मोबाइल टावर भी स्थापित किए गए हैं।
और पढ़ें...
विज्ञापन
विज्ञापन
Next