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जम्मू एंड कश्मीर: स्टोन क्रशर्स पर एनजीटी हुई सख्त, शिकायतों पर गौर के लिए सीपीसीबी की अगुआई में समिति गठित

Sat, 03 Jul 2021 04:22 AM IST
Kuldeep Singh एजेंसी, नई दिल्ली

सार

  • ट्रिब्यूनल ग्राम सरपंच आरती शर्मा द्वारा मैसर्स डायमंड और मैसर्स शंकर के खिलाफ दायर याचिका में यह भी कहा गया है कि जम्मू-कश्मीर लगातार पर्यावरण नियमों का उल्लंघन कर रहा है।
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एनजीटी - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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जम्मू एंड कश्मीर में इन दिनों अवैध खनन और आवासीय क्षेत्रों में स्टोन क्रशर्स से पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचा है। स्टोन क्रशर भारी प्रदूषण का कारण बनते हैं और इस तरह के अवैज्ञानिक खनन से पर्यावरण खराब होता है। इनके संचालन के खिलाफ राजौरी जिले में एक जनहित याचिका दायर की गई थी, जिसकी सुनवाई करते हुए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने शुक्रवार को याचिका पर गौर करने के लिए एक समिति का गठन किया है।

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10 नवंबर से पहले ई-मेल से समिति को पेश करनी है रिपोर्ट
ट्रिब्यूनल ने गठित समिति से मामले में तथ्यात्मक और कार्रवाई की रिपोर्ट 10 नवंबर, ई-मेल द्वारा सुनवाई की अगली तारीख से पहले प्रस्तुत करने को कहा है। ट्रिब्यूनल ग्राम सरपंच आरती शर्मा द्वारा मैसर्स डायमंड और मैसर्स शंकर के खिलाफ दायर याचिका में यह भी कहा गया है कि जम्मू-कश्मीर लगातार पर्यावरण नियमों का उल्लंघन कर रहा है।

एनजीटी अध्यक्ष न्यायमूर्ति आदर्श कुमार गोयल की अध्यक्षता वाली पीठ ने शिकायतों को देखने और गैर-अनुपालन की सीमा का पता लगाने के लिए केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी), राज्य पीसीबी और जिला मजिस्ट्रेट, राजौरी की एक संयुक्त समिति का गठन किया। पीठ ने कहा कि यह सर्वविदित है कि स्टोन क्रशर में भारी प्रदूषण की संभावना होती है और ऐसे स्टोन क्रशर के लिए अवैज्ञानिक खनन पर्यावरण को और खराब करता है।
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पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम 1986, जल प्रदूषण रोकथाम और नियंत्रण अधिनियम 1974, वायु प्रदूषण रोकथाम और नियंत्रण अधिनियम 1981 के तहत वैधानिक सुरक्षा उपायों का पालन और निगरानी वैधानिक नियामकों द्वारा किए जाने की आवश्यकता है। उल्लंघन कानून के तहत आपराधिक अपराध होने के कारण, निवारक और उपचारात्मक कार्रवाई करने की आवश्यकता है, जिसमें अवैध गतिविधियों को रोकने तक पिछले उल्लंघनों के लिए ‘प्रदूषक भुगतान’ सिद्धांत पर मुआवजे की वसूली भी शामिल है।

मुआवजे में खनन सामग्री, पारिस्थितिक सेवाओं की लागत भी शामिल
एनजीटी ने कहा कि समिति द्वारा सत्यापन के आधार पर, वैधानिक नियामक पर्यावरण को और नुकसान को रोकने के लिए कार्रवाई कर सकते हैं और पिछले उल्लंघनों लिए मुआवजे का आकलन और वसूली कर सकते हैं। मुआवजे में न केवल खनन सामग्री की लागत शामिल हो सकती है, बल्कि बहाली और पारिस्थितिक सेवाओं की लागत भी शामिल हो सकती है, जो कि निवारक तत्व के साथ हमेशा के लिए छोड़ दी गई है। पीठ ने कहा कि इस संबंध में सीपीसीबी द्वारा निर्धारित दिशा-निर्देशों का पालन किया जा सकता है। एनजीटी ने कहा कि मामले में तथ्यात्मक और कार्रवाई की रिपोर्ट इस ट्रिब्यूनल को 10 नवंबर, ई-मेल द्वारा सुनवाई की अगली तारीख से पहले प्रस्तुत की जा सकती है।

मैसर्स डायमंड और मैसर्स शंकर के खिलाफ याचिका पर सुनवाई  
 ट्रिब्यूनल ग्राम सरपंच आरती शर्मा द्वारा मैसर्स डायमंड स्टोन क्रशर और मैसर्स शंकर स्टोन क्रशर, वीपीओ सरनू तहसील, जिला राजौरी, जम्मू-कश्मीर द्वारा स्टोन क्रशर के संचालन के खिलाफ दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रहा था। जम्मू-कश्मीर, पर्यावरण नियमों का उल्लंघन कर रहा है। आवेदक के अनुसार उक्त स्टोन क्रशर आवासीय क्षेत्र एवं तवी नदी के समीप स्थित है। भूजल निकालने के लिए अवैध बोरवेल खोदे गए हैं। आवश्यक पर्यावरण मंजूरी नहीं ली गई है। भारी मशीनरी का उपयोग कर तवी नदी के तट पर भी अवैध खनन किया जाता है।

अपेक्षित ग्रीन बेल्ट, आवश्यक प्रदूषण नियंत्रण उपकरण का अभाव  
परिवहन के लिए वाहनों का उपयोग करने से वायु प्रदूषण होता है। इसके परिणामस्वरूप जल स्तर का कम होना, जल की कमी, कृषि उत्पादकता में कमी, जैव विविधता की हानि, भूमि का क्षरण, मृदा अपरदन, अनुत्पादक बंजर भूमि, ध्वनि प्रदूषण, धूल प्रदूषण, जल प्रदूषण, वनस्पति की हानि  हुआ। याचिका में कहा गया है कि स्टोन क्रशर ने न तो आवश्यक प्रदूषण नियंत्रण उपकरण स्थापित किए हैं और न ही अपेक्षित ग्रीन बेल्ट बनाए हैं और न ही अन्य सुरक्षा उपायों को अपनाया है।

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