केंद्रीय चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक इस बार जम्मू कश्मीर के शुरुआती दो चरणों की 50 विधानसभा सीटों पर 485 प्रत्याशियों ने पर्चा भरा है। इनमें से 214 प्रत्याशी तो निर्दलीय हैं, जो विधानसभा चुनाव में उतरे हैं। यह आंकड़ा तकरीबन 45 फीसदी के करीब बनता है। 18 सितंबर को होने वाले पहले चरण के मतदान में 24 विधानसभा सीटों पर 92 निर्दलीय प्रत्याशियों ने ताल ठोकी है। जबकि दूसरे चरण की होने वाली 26 सीटों पर 122 निर्दलीय प्रत्याशी मैदान में है। राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार अखिल रैना कहते हैं कि जम्मू कश्मीर के इतिहास में पहली दफा इतने ज्यादा निर्दलीय प्रत्याशी चुनाव लड़ रहे हैं।
घाटी में ज्यादा निर्दलीय प्रत्याशियों के चुनाव मैदान में उतरने की वजह बताते हुए अखिल कहते हैं कि दरअसल कई संगठनों को राजनीतिक दल की मान्यता नहीं मिली। क्योंकि इन संगठनों से जुड़े हुए लोग चुनाव की तैयारी में पहले से लगे हुए थे। जब उनके संगठनों को राजनीतिक दल की मान्यता नहीं मिली, तो यह निर्दलीय सियासी मैदान में उतर गए। रैना का कहना है कि घाटी के कुछ प्रतिबंध और जबकि कुछ अन्य संगठन भी राजनीतिक दल बनाकर चुनाव में उतरना चाहते थे। ऐसा संभव नहीं हुआ। नतीजतन अलगाववादियों से लेकर उनके समर्थकों ने सियासी मैदान में ताल ठोकी है। इसमें प्रतिबंधित संगठन जमात ए इस्लामी से लेकर तहरीक ए आवाम से जुड़े हुए लोग चुनावी मैदान में उतर गए।
केंद्रीय चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक 10 साल पहले हुए विधानसभा चुनाव में 278 उम्मीदवार चुनावी मैदान में थे। इनमें से इन दो चरणों में महज कुछ 87 निर्दलीय प्रत्याशी ही चुनाव लड़ रहे थे। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक 2014 के इन दो चरणों के विधानसभा चुनाव में तीन निर्दलीय प्रत्याशी चुनाव भी जीते थे। आयोग के आंकड़े बताते हैं कि 2014 से पहले हुए 2008 के विधानसभा चुनाव में भी 518 प्रत्याशी मैदान में थे। इन प्रत्याशियों की संख्या में 190 निर्दलीय प्रत्याशी चुनाव लड़ रहे थे। 2008 में भी चार निर्दलीय विधायक चुने गए थे।
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक डॉ दीपक कौशल कहते हैं कि इस बार निर्दलीयों के ज्यादा चुनाव मैदान में उतरने से जम्मू कश्मीर में कई राजनीतिक दलों का सियासी खेल बिगाड़ सकती है। उनका कहना है कि जितने ज्यादा निर्दलीय प्रत्याशी इस बार चुनाव मैदान में उतरे हैं, उनमें से कई संगठन और लोग क्षेत्रीय दलों के साथ मिलकर चुनाव में प्रतिभाग करते थे या उनको खुले तौर पर समर्थन देते थे। ऐसे में जब यह प्रत्याशी बनकर खुद चुनावी मैदान में उतरे हैं, तो अनुमान यही लगाया जा रहा है कि क्षेत्रीय दलों के वोट बैंक में सेंधमारी हो सकती है। ऐसे हालातों में फायदा भारतीय जनता पार्टी को होता है या किसी अन्य दल को यह तो चुनाव परिणाम बताएंगे। लेकिन अभी माना यही जा रहा है कि ज्यादा निर्दलीयों के सियासी मैदान में उतरने से स्थानीय दलों का वोट बैंक इन निर्दलीयों में बंट सकता है।
वहीं, भारतीय जनता पार्टी के रणनीतिकारों की मानें तो इस विधानसभा चुनाव में पार्टी बहुत सधी हुई रणनीति से चुनाव लड़ रही है। वरिष्ठ पत्रकार अखिल रैना कहते हैं कि जम्मू कश्मीर की 90 विधानसभा सीटों पर भारतीय जनता पार्टी ने महज 62 सीटों पर ही अपने उम्मीदवार उतारे हैं। इसमें भी भारतीय जनता पार्टी ने जम्मू रीजन की सभी 43 सीटों पर अपने उम्मीदवार दिए हैं। जबकि कश्मीर रीजन की 47 सीटों में से सिर्फ 19 को टिकट दिया है। रैना कहते हैं कि जम्मू में 13 सीटों को छोड़ दें, तो अधिकतर सीटें हिंदू बाहुल्य हैं। ऐसे में भाजपा ने सभी 43 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारकर यहां से अधिकतर सीटें जीतने की योजना बनाई है। वहीं भाजपा ने घाटी में दक्षिण कश्मीर की 16 विधानसभा सीटों से 8, मध्य कश्मीर की 15 में 6 और उत्तर कश्मीर की 16 सीटों से 5 उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है।