सुब्रह्मण्यम इससे पहले साल पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के निजी सचिव के तौर पर भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं और यूपीए सरकार में केंद्र में सह सचिव भी रह चुके हैं और नरेन्द्र मोदी सरकार में पीएमओ में भी काम करने का अनुभव है। छत्तीसगढ़ के अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) रहते हुए सुब्रह्मण्यम के पास नक्सल प्रभावित राज्य में माओवादियों के खिलाफ पुलिस के 'सबसे कठिन युद्ध' को चलाने का श्रेय जाता है।
सूत्रों का कहना है कि सुब्रह्मण्यम को आतंकवांद से प्रभावित जम्मू-कश्मीर में भेजना से साफ संकेत जाता है कि सरकार आतंकियों के खिलाफ आक्रामक नीति जारी रखने के लिए प्रतिबद्ध है। सूत्रों के मुताबिक आने वाले वक्त में जम्मू-कश्मीर में सुरक्षाबलों को सैन्य अभियान ऑपरेशन ऑलआउट फिर से शुरू करने का निर्देश दिया जा चुका है और जिसके परिणाम आने वाले वक्त में देश के सामने होंगे।
सुत्रों का कहना है कि आने वाले वक्त में जल्द ही कुछ और अधिकारियों की भी नियुक्ति होगी। अपनी आक्रामक नीति के तहत सरकार न केवल आतंक विरोधी ऑपरेशंस चलाएगी बल्कि पत्थरबाजों और अलगाववादियों के खिलाफ भी मजबूती से निबटेगी। सूत्रों का कहना है कि राज्यपाल शासन के दौरान अगर एक भी घटना होती है तो यह सरकार की नाकामी दिखाएगी।
सूत्रों के मुताबिक जम्मू-कश्मीर कैडर के आईपीएस अधिकारी एसएम सहाय को भी जल्द ही वापस अपने मूल कैडर में भेजा जा सकता है। सहाय फिलहाल नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल सेक्रेटिएट में में तैनात हैं और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के बेहद करीबी भी हैं।
2016 में हिजबुल आतंकी बुरहान वानी की मौत के बाद बढ़ रहे प्रदर्शनों से नाराज होकर महबूबा सरकार के दबाव के बाद सहाय का ट्रांसफर कर दिया गया था। उनके ट्रांसफर से महबूबा कश्मीरियों में यह संदेश देना चाहती थीं कि वह बल प्रयोग के बजाय प्रशानिक स्तर पर निबटाने में भरोसा रखती हैं।