अक्सर घर की बेटियों को यह सलाह दी जाती है कि "देर रात तक घर से बाहर रहना सही नहीं है, फलां मोहल्ला या फलां इलाका उनके लिए सेफ नहीं है... जल्दी काम निपटाओ जल्दी घर आओ"।
लेकिन क्या आपने कभी ये सोचा है कि लड़कियों को बंदिशों की इन बेडियों में जकड़ने से हम उनकी आजादी पर तो बंदिश लगा ही रहे हैं उनकी उड़ान पर भी लगाम लगा रहे हैं। उनके हौसलों और इच्छाओं को भी समाज की गैरजरूरी बंदिशों तले दाब दे रहे हैं।
आखिर जब एक लड़का देर रात तक घर से बाहर रह सकता है चाहे वो काम के नाम पर हो या घूमने फिरने के तो फिर एक लड़की को ऐसा माहौल क्यों नहीं मिलना चाहिए, क्या वह बराबरी की हकदार नहीं है। उस पर लगाम लगाने से अच्छा, क्यों न हम अपने बेटों को इसके लिए तैयार करें कि वह लड़कियों के प्रति अपना नजरिया बदलें।
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अकेली लड़कियों को देखकर चमकने वाली उनकी आंखें उन्हें मौका नहीं एक जिम्मेदारी समझें। आखिर क्यों न हम लड़कों को ये समझाएं कि जो आज किसी और की बहन या बेटी के साथ हो रहा है कल को वो हमारे साथ भी हो सकता है।
लड़कियों पर पाबंदी लगाने के बजाय क्यों न एक ऐसा जिम्मेदार समाज तैयार करें जहां हर बेटी खुलकर सांस ले सके और अपनी मर्जी और सहूलियत से घर आ जा सके, उसे न अकेले चलते डर लगे न अकेले रहते।