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नीरज जी ने कहा था- इच्छा है कि कविता पढ़ते हुए ही प्राण निकलें

Fri, 20 Jul 2018 06:27 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, अलीगढ़
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ज्योतिष, अंकशास्त्र और आयुर्वेद का अच्छा ज्ञान रखने वाले गीतकार गोपाल दास नीरज अक्सर बातचीत में कहते थे कि उनकी आखिरी इच्छा यही है कि उनके प्राण भी कविता पढ़ते हुए मंच पर ही निकलें। यही कारण था कि श्रृंगारिक गीतों के अलावा उनकी कविता में जीवन के प्रति नश्वरता का भाव भी देखने को मिलता है।

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नीरज की रचनाओं में जीवन के प्रति नश्वरता का भाव भी रहा

1990 के बाद से नीरज के काव्य में एक नई चीज यह देखने को मिली कि उसमें दार्शनिक भाव शामिल होना शुरू हो गया। वह कहते कि ‘कोई चला तो किसलिए नजर डबडबा गई, श्रृंगार क्यों सहम गया, बहार क्यों लजा गई, न जन्म कुछ, न मृत्यु कुछ, बस इतनी सिर्फ बात है, किसी की आंख खुल गई, किसी को नींद आ गई’। 

इसके अलावा अन्य रचनाओं में भी यही नजरिया प्रदर्शित होने लगा। वर्ष 2011 में जब पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम अलीगढ़ आए तो नीरज ने उनके साथ मंच साझा किया। इस दौरान नीरज ने कलाम को दशावतारम की पूरी थ्यौरी सुनाई। बेहद सारगर्भित तरीके से की गई इस प्रस्तुति से कलाम बेहद प्रभावित हुए। 
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इसके अलावा नीरज ने कई बार कहा कि मैं आखिरी सांस तक सक्रिय रहना चाहता हूं। मेरे प्राण भी निकलें तो कविता पढ़ते हुए ही निकलें। अमर उजाला आगरा संस्करण के 70 वर्ष पूर्ण होने पर लिखी गई टिप्पणी। यह टिप्पणी आगरा संस्करण में छप चुकी है।

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